सूखा है तो है, उन्हें तो सिर्फ सत्ता से मतलब है!

सूखा है तो है, उन्हें तो सिर्फ सत्ता से मतलब है!


पुष्यमित्र /

इन दिनों बिहार समेत लगभग पूरा देश भीषण सूखे का सामना कर रहा है, अगर 5-7 फीसदी लोगों को छोड़ दिया जाये जो समर्सिबल पम्प का इस्तेमाल करते हैं तो शेष आबादी के लिये पीने और घरेलू इस्तेमाल के लिये पानी जुटाना दैनिक संघर्ष का हिस्सा बन गया है। मगर आपने किसी राजनेता या राजनीतिक दल को इस मसले पर जनता के साथ खड़े देखा। सत्ता को छोड़ दीजिये विपक्षी दल भी इस मुद्दे पर कोई बात नहीं कर रहे। यह सिर्फ इस सूखे की बात नहीं है, पिछ्ले साल जब बिहार में बाढ़ आई थी तब भी मुख्य विपक्षी दल राजद के लिये यह कोई मुद्दा नहीं था। जबकि लोकतंत्र का तकाजा था कि इस मसले पर वह सड़क पर उतर कर सरकार की ईंट से ईंट बजा देता।यह सिर्फ बिहार की या राजद की बात नहीं है। कांग्रेस ही कहां देश में इस मसले पर लोगों के साथ खड़ी है। या पिछ्ले पूरे पांच साल में कब वह जनता के मुद्दों के लिये सड़क पर उतरी। उचित तो था सत्ता पक्ष के लोग भी सहानुभूति दिखाने ही सही, मगर लोगों के साथ खड़े तो होते। कभी यह राजनीति का मूल चरित्र हुआ करता था, अब यह कहीं नजर नहीं आता। दिलचस्प है कि जिस चेन्नई में आज पानी के लिये हाहाकार मचा है वहां हिन्दी-तमिल का झगड़ा राजनीति के केंद्र में है और हमारे मिथिला में जहां सारे तालाब पोखर सूख गये हैं वहां राज्य में नए मन्त्रियों की ताजपोशी हॉट टॉपीक है। नए जल संसाधन मन्त्री का जश्न चल रहा है।

अभी हाल में बीते लोक सभा चुनाव में ही देखिये मुद्दे क्या थे, पुलवामा हमला, पकिस्तान, मुसलमान और राष्ट्रवाद। न नोटबंदी पर बहस हुई, न GST की तकलीफें सामने आई, न सृजन का सवाल उठा, न व्यापम पर बात हुई। बेरोजगारी, किसानों का संकट और ऐसे ही दूसरे मुद्दे धड़े के धड़े रह गये। क्यों? क्या यह सिर्फ विपक्ष का फेल्योर है या हमारी पूरी राजनीति का, लोकतंत्र का?दरअसल, आज की राजनीति पूरी तरह चुनाव केंद्रित होकर रह गयी है। चुनाव जीत लेने की कुशलता किसी दल को महान और किसी को असफल बनाती है। और बड़े दिलचस्प तरीके से राजनीतिक दलों ने कोर मुद्दों को छुए बगैर चुनाव लड़ने का कौशल विकसित कर लिया है। कुछ सालों से यह स्टेटमेंट राजनीति का हर जानकार दे देता है कि काम करने से चुनाव थोड़े ही जीते जाते हैं। यह तो स्किल है कि आप वोटरों की भावनाओं को कैसे अपने पक्ष में कर लेते हैं।

और दुनिया के सबसे विशाल, 70 साल पुराने लोकतंत्र का वोटर आज भी भावनाओं में बह कर वोटिंग करता है। वह सब्जी वाले, दूध वाले, रिक्शा वाले से तो मोल मोलाई कर लेता है मगर पांच साल की सरकार चुनते वक़्त भावनाओं में बह जाता है। अरे अपने जात का आदमी इतने साल बाद चुनाव में खड़ा हुआ है कैसे छोड़ दें। अरे साहब ने भले ही कोई काम न किया हो, मगर पाकिस्तानीयों को सबक तो सिखा दिया। कुछ दशक पहले तक तो लोग इस बात पर वोट दे देते थे कि इन्दिरा जी का मुंह सुखा गया है।इन सब में सबसे खतरनाक भूमिका आजकल हमारे हमपेशा टीवी मीडिया की हो गयी है। अगर कोई शोधार्थी इनके प्राइम टाईम डिबेट का विश्लेषण करे तो पायेगा कि 10 में से 9 डिबेट नॉन इश्यू पर होते हैं। इन्होंने लोगों के सोचने का तरीका बदल दिया है। जब वे गैलन लेकर पानी के लिये सड़क पर भटक रहे होते हैं तो दिमाग में चल रहा होता है कि साला मियां सब चार शादी करता है, पन्द्रह बच्चे पैदा करता है। इस बार मोदी जी इनको जरूर सबक सिखायेंगे।

पुष्यमित्र। पिछले डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय। गांवों में बदलाव और उनसे जुड़े मुद्दों पर आपकी पैनी नज़र रहती है। जवाहर नवोदय विद्यालय से स्कूली शिक्षा। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता का अध्ययन। व्यावहारिक अनुभव कई पत्र-पत्रिकाओं के साथ जुड़ कर बटोरा। प्रभात खबर की संपादकीय टीम से इस्तीफा देकर इन दिनों बिहार में स्वतंत्र पत्रकारिता  करने में मशगुल ।

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