सिंघु बॉर्डर पर अन्नदाता का हौसला और इरादा पक्का है…

सिंघु बॉर्डर पर अन्नदाता का हौसला और इरादा पक्का है…

वीरेन नंदा 

किसानों का हाल जानने के लिए मैं बिहार से दिल्ली तो आ गया, लेकिन   दिल्ली की गलियों से अनजान मुझे सिंघु बॉर्डर जाने का रास्ता नहीं पता था । इससे पहले कभी सिंघु बॉर्डर शायद ही जाना हुआ हो । किसी से पूछने पर पता चला कि आनंद विहार से सिंघु बॉर्डर के लिए सवारी मिलेगी। लिहाजा आनंद विहार जाकर एक ऑटो बुक किया और सिंघु बॉर्डर के लिए निकल दिया । करीब एक घंटे की यात्रा के बाद बॉर्डर के बेरिकेड के समीप सरदारजी ने ऑटो रोक कर बताया कि ‘लो जी आ गया आपका सिंधु बॉर्डर। ऑटो से ‘उतरते हुए मैंने पूछा क्यों सरदार जी, ये आपका बॉर्डर नहीं?  तो सरदार ने कहा- ‘क्यों नहीं प्रा जी, ये सभी का है। जो भी किसान के समर्थन में हैं उन सबका है। खैर ऑटो का भाड़ा देने के बाद मैं बेरिकेड की ओर बढ़ा तो देखा भारी संख्या में पुलिस के जवान वहाँ खड़े हैं । एक पल तो अचानक झिझक गया और सोचने लगा कि ये जवान बेरिकेड पार करने देंगे भी या नहीं ।  लेकिन जब देखा कुछ लोग बैरिकेड के आगे जा रहे हैं तो मैं भी उनके पीछे-पीछे बैरियर पार कर किसानों के टोले की ओर बढ़ा । करीब एक किलोमीटर की पद-यात्रा के बाद एक और बैरिकेड मिला । जहां पुलिसवालों ने दाहिने ओर इशारा करते कहा- ‘उधर से।’ मैं दाहिने की ओर मुड़ कर एक नाले की तरफ से आगे बढ़ा। जहां मुझे चाय का ठेला और पकौड़ी की दुकान दिखी, जिसमें पुलिस वाले खड़े चाय पी रहे थे और कुछ गर्म पकौड़ी का आनंद उठा रहे थे। मैं भी खड़ा हो गया और वहाँ एक कट चाय पी और चाय वाले से गंतव्य तक पहुँचने का रास्ता पूछा तो उसने कहा कि सीधे जाकर जो पहला बायां कट मिले, वहां से मुड़कर सीधे करीब दो किलोमीटर जाने के बाद फिर बायां कट मारना, आ जायेगा। यानी अन्नदाता तक पहुंचने के लिए अभी दो किमी और पैदल चलना होगा । धूप काफी खिली हुई थी, तेज धूप में मैं मंजिल की ओर बढ़ा और चलते चलते पसीने से लथपथ हो गया। इस रास्ते से गुजरते हुए पता चला कि मैं सिंधु गाँव से गुज़र रहा हूँ, क्योंकि एक जगह इस नाम का प्लेट रास्ते में टंगा दिखा।

करीब तीन महीनों से धरना दे रहे किसानों के बीच पहुँच मेरी सारी थकान दूर हो गई। धरना स्थल पर करीब ढाई किलोमीटर का चक्कर लगाता, ट्रक, ट्रैक्टर व रोड पर बने टेंट में बैठे लोगों से मिलता, बताता कि ‘बिहार से आया हूँ’, बात करता, तस्वीर लेता घूमता रहा। कहीं लंगर चल रहा था तो कहीं मुफ़्त दवा का वितरण, तो कहीं चाय का हांडा चढ़ा था। कहीं महिलाओं का झुंड बैठकर सब्जी और प्याज काटता दिखा। वहाँ धरना दे रहे किसानों के अलावा भी बहुत से राहगीरों को लंगर और चाय के स्टाल पर लाइन लगा खाना छकते देखा। किसी बाहरी लोगों को कोई मनाही नहीं थी। बॉर्डर के पास के दुकानदारों से बात करने पर पता चला कि उन्हें शुरू के समय डर जरूर लगा था लेकिन उनके आने के बाद हमारी दुकान का सेल घटा नहीं, कुछ बढ़ा ही है और वे सभी हमें बहुत मदद करते हैं। वाहे गुरु का प्रसाद खाने लंगर में बुलाते भी हैं। किसानों से बात करने के बाद यह साफ़ और स्पष्ट दिखा कि वे सभी बेहद जागरूक ही नहीं, इन तीनों कृषि-कानून का स्याह पक्ष भी बख़ूबी जानते हैं और आने वाले दिनों में इसके क्या परिणाम होंगे, उससे भली भांति परिचित हैं। सरकार के रवैये से उन किसानों में इतना गुस्सा बढ़ता जा रहा है कि अब लोग कहने लगे हैं कि मोदी हमारे देश के प्रधानमंत्री नहीं, अम्बानी-अडानी के दलाल बन गए हैं ।

उन किसानों का मानना है कि अब, जब सरकार से बातचीत रुक गई है और वे नकली किसान संगठन से बात कर रही है, तब जरूरत आ गई है कि कॉरपोरेट के हितों की रक्षा करने पर उतारू इस सरकार की पोल पूरे देश के स्तर पर खोली जाए। मोदी की गोद में बैठी मीडिया, धार्मिक और फासीवादी गुंडों को बेपर्द किये जाने की ज़रूरत है । उन्होंने कहा कि ये लंबी चलने वाली लड़ाई है। इसलिए अब तीनों कानून को रद्द कराने, पूरे देश में न्यूनतम समर्थन मूल्य, सरकारी खरीद और भंडारण का अधिकार किसानों को दिलाने, जीवन की आवश्यक वस्तुओं को आवश्यक्तानुसार जनवितरण प्रणाली द्वारा कम कीमत पर उपलब्ध कराने तथा 2020 बिजली बिल और पराली जलाने वाला घातक कानून रद्द कराने तक यह आंदोलन चलेगा। इसमें लंबा समय लग सकता है। हो सकता है कि और 3 महीने चले ये आंदोलन या 3 साल या फिर 5 साल। जितना भी लंबा चले ! हम उसके लिए तैयार हैं। यह किसानों के करो या मरो का प्रश्न है इसलिए उस काले कानूनों के ख़त्म होने तक लगातार चलने वाला यह आंदोलन बन चुका है। अब इसे लगातार चलाये जाने की जरूरत है, जिसके लिए हम तैयार हैं। यह अपनी ज़मीन को कॉरपोरेट के हाथों में जाने देने से बचाने के लिए आंदोलन है। इसलिए हमें 2024 तक बैठना पड़े तो हम बैठेंगे, हिलेंगे नहीं।

एक किसान ने यहां तक कहा कि ‘कोई यह ना समझे कि यह सिर्फ किसानों का आंदोलन है। यदि यह कानून रह गया तो इससे पूरे भारत की आबादी प्रभावित ही नहीं होगी, भूखों मरेगी। यह सभी को समझना होगा और किसानों के अलावा दूसरे क्षेत्र के लोगों को भी आगे आना होगा। लोग आ रहे हैं। दूसरे भी समर्थन करने लगे हैं। देश के बाहर भी हमें समर्थन मिलना शुरू हो गया है।‘ सिंघु बॉर्डर पर बैठे किसानों की बातें सुनकर ऐसा लगा जैसे वो अमेरिकी में खेती में कारपोरेट कल्चर की कामियों पर अच्छा रिसर्च करिए हुए हैं। एक किसान ने बताया कि ‘सरकार और कॉरपोरेट दोनों इस देश की ज़मीन और अनाज पर गिद्ध की तरह नज़र गड़ाए बैठे हैं। सुना ही होगा कि बिल गेट्स अमेरिका का सबसे बड़ा किसान बन चुका ! उसके पास करीब ढाई लाख एकड़ जमीन हो चुकी है। सरकार इन्हीं कॉरपोरेट के धनबल पर अभी बंगाल-चुनाव में अकूत पैसा झोंक रही है और हमें  पिज्जा और बर्गर खाने वाला किसान बता बदनाम करने की कोशिश की गई।

जब मैंने उनसे 26 जनवरी की हिंसा का जिक्र किया तो तबाक से एक किसान बोल पड़े और कहा कि ‘26 जनवरी को ट्रैक्टर मार्च को बदनाम करने के लिए लाल किला कांड सरकार द्वारा प्रायोजित कराया गया ।  यह सोचने वाली बात है कि पिछले दो महीनों से हमारा अहिंसात्मक आंदोलन चल रहा था। हमने हमेशा शांतिपूर्ण आंदोलन चलाया। वार्ता बार-बार विफल होने के बाद भी कभी न तो उत्तेजित हुए या क्रोध ही प्रकट किया तब हम ऐसा क्यों करते ? जब हमें मार्च की अनुमति मिली तो हमारे 7 मार्ग पर मार्च शांतिपूर्ण रही, जबकि अनुमति दिए गए रास्ते पर भी बेरिकेड और अवरोध खड़े किए गए। लाल किले वाले रास्ते पर 26 जनवरी या 15 अगस्त को एक पत्ता भी नहीं हिल सकता तब ट्रैक्टर का हुजूम वहाँ तक कैसे पहुँचा ? किसने रास्ता खोला और लालकिला तक उन्हें पहुँचाने में मदद की। लाल किले पर हंगामा करने वाले सरकार के लोग थे जिसकी तस्वीर मोदी और शाह के साथ बहुतों बार छपी और मीडिया में अभी भी घूम रही। ये वही नकली किसान संगठन के लोग थे जिनसे सरकार बात कर रही। ये बात अब सभी बखूबी समझते हैं।‘

 बातचीत के दौरान पता चला कि किसानों के मन में अफ़सोस है कि दूसरी बार उन्हें वोट देकर अपने पैर में कुल्हाड़ी मारी। यह वोट उन्हें इसलिए दिया था कि उन्होंने स्वामीनाथन रिपोर्ट लागू करने की बात की थी, लेकिन वह भी 15 लाख और अन्य झूठे वादों की तरह जुमला ही निकला। कोरोना के बहाने चुपचाप अलोकतांत्रिक ढंग से यह कानून बना थोप दिया। वे कहते हैं कि यह किसानों की बेहतरी के लिए है। हमने उनसे ऐसी बेहतरी माँगी थी क्या ? कोई भी पढ़ा लिखा व्यक्ति इस झूठ को साफ़ समझ सकता है। उन्होंने सोचा कि हमलोग तो अनपढ़ हैं और इस कानून को समझ नहीं पाएंगे, लेकिन ये उनकी भूल थी। तीसरे कानून में जमाखोरी को अपराध से मुक्त किया जाना ही इस बात का स्पष्ट संकेत है कि इस सरकार की क्या मंशा है ! अब किसान जागरूक हो गए हैं और देश के अन्य किसानों को भी जागरूक किया जा रहा है। सरकार को इसका ख़ामियाजा भुगतना होगा…..।

इस आंदोलन के समर्थन में अबतक पहलवान करतार सिंह पद्मश्री और अर्जुन अवार्ड, पूर्व राष्ट्रीय बॉक्सिंग कोच गुरुबख्श सिंह द्रोणाचार्य अवार्ड, हॉकी चैंपियन गुरमेल सिंह ध्यानचंद अवार्ड, पूर्व बास्केटबॉल खिलाड़ी सज्जनसिंह चीमा अर्जुन अवार्ड, वेटलिफ्टर तारा सिंह अर्जुन अवार्ड और कबड्डी खिलाड़ी हरदीप सिंह अर्जुन अवार्ड से नवाज़े गए लोगों ने अपने-अपने अवार्ड लौटाने की घोषणा कर दी है। एफ ए आई गोल्डन जुबली अवार्ड फॉर एक्सीलेंस और गोल्ड मेडल लेने से पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के भू-रसायन विशेषज्ञ डॉ. वारीन्द्रपाल सिंह ने इनकार कर दिया है। “मैं पहले किसान हूँ फिर पुलिस ऑफिसर। मैं आज जो कुछ भी हूँ वह इसलिए कि मेरे पिता ने खेत में काम किया” – यह कहते हुए पंजाब के डीआईजी ने पद से त्यागपत्र दे दिया हैं।

 किसान आंदोलन में शिरक़त कर रहे लोगों के जज़्बे को सलाम करता मैं सिंघु बॉर्डर से वापस लौट आया और गाजीपुर समेत दूसरे बॉर्डर पर जाने की इच्छा और बलवती हो गई है।

वीरेन नन्दा।  बाबू अयोध्या प्रसाद खत्री स्मृति समिति के संयोजक। खड़ी बोली काव्य -भाषा के आंदोलनकर्ता बाबू अयोध्या प्रसाद खत्री पर बनी फिल्म ‘ खड़ी बोली का चाणक्य ‘ फिल्म के पटकथा लेखक एवं निर्देशक। ‘कब करोगी प्रारम्भ ‘ काव्यसंग्रह प्रकाशित। सम्प्रति स्वतंत्र लेखन। मुजफ्फरपुर ( बिहार ) के निवासी। बदलाव के अतिथि संपादक रह चुके हैं। आपसे मोबाइल नम्बर 7764968701 पर सम्पर्क किया जा सकता है।

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