प्रेस क्लब के नए अध्यक्ष खांटी पत्रकार उमाकांत लखेरा

प्रेस क्लब के नए अध्यक्ष खांटी पत्रकार उमाकांत लखेरा


राजेश बादल

अरसे बाद प्रेस क्लब ऑफ इंडिया को एक खांटी पेशेवर पत्रकार अध्यक्ष के रूप में मिला है । भाई उमाकांत लखेरा मेरे बहुत पुराने मित्र और भाई जैसे हैं । लेकिन मैं इसलिए उनकी जीत से प्रसन्न नही हूं कि वे मेरे मित्र हैं,बल्कि इसलिए कि उनके नेतृत्व में प्रेसक्लब उन ऊंचाइयों को छुएगा, जिसके लिए उसकी स्थापना हुई थी । उमा कांत जी पत्रकारिता के सरोकारों और प्रतिबद्धताओं को लेकर कोई समझौता नहीं करने वाले साथी हैं । मूल्यों की कसौटी पर कोई मसला खरा साबित हो जाए तो फिर उनका कैसा भी नुकसान हो जाए, वे परवाह नहीं करते । हम लोग अनेक चैनलों में वैचारिक बहसों में शामिल होते रहे हैं । मैंने पाया है कि आज की पत्रकारिता में जिस तरह के पत्रकारों की कमी होती जा रही है, वे उनमें से एक हैं । राज्य सभा टीवी का संपादक रहते हुए मैनें उन्हें कई बार चर्चाओं में आमंत्रित किया । यह संतोष की बात रही कि भारतीय संसदीय लोकतंत्र के बारे में उनके विचारों को सदैव दर्शकों ने पसंद किया है ।
यह 1985 की बात है । उन दिनों मैं नवभारत टाइम्स ,जयपुर में मुख्य उप संपादक था तो उमा कांत लखेरा जी उत्तराखंड से लेख भेजा करते थे । राजेंद्र माथुर हमारे प्रधान संपादक थे और वे अक्सर उमा जी के लेख अपनी टिप्पणी के साथ हमारे पास भेज देते थे । वे लेख बेहद साहसिक, निर्भीक और निष्पक्ष पत्रकारिता की आवाज़ होते थे । उमा जी ने शराब माफिया और सियासत के गठजोड़ को बेनकाब किया तो चिपको आंदोलन के पर्यावरणीय सरोकारों को पुरजोर ढंग से उठाया । मैंने अधिकतर लेख संपादकीय पन्ने पर प्रकाशित किए । तब तक वे पूर्णकालिक पत्रकारिता में नहीं आए थे ।इसी बीच विश्वमानव,दैनिकजागरण,सहारा और हिंदुस्तान होते हुए वे हिंदी पत्रकारिता की मुख्य धारा में शामिल हो गए ।उन दिनों बिहार के बाहुबली शहाबुद्दीन की मांद में जाकर उसके खिलाफ़ लिखने का साहस उमाकांत लखेरा ही कर सकते थे ।

कारगिल जंग के दौरान हाड़ कंपाने वाली ठंड में उनकी रिपोर्टिंग गर्मी भरती थी । पोखरण में भारतीय सेना की एक मारक मिसाइल जब अपना लक्ष्य भेद नहीं पाई तो लखेरा जी ने फौज की कार्यप्रणाली की बखिया उधेड़ दी । यूपीए के शासन काल में अध्यक्ष सोनिया गांधी के लिए जब आली शान कार्यालय बनाया जा रहा था तो उसके औचित्य पर उमाकांत जी ने ही सवाल सबसे पहले उठाए ।यह रपट हिंदुस्तान में ही छपी, जिसकी मालकिन शोभना भरतिया थीं और वे भी कांग्रेस की संसद थीं । इस रिपोर्ट के छपने के बाद ज़ाहिर है वह दफ्तर दफ़न हो गया । ऐसे अनगिनत किस्से हैं । अच्छी बात यह है कि ऐसे अनेक अवसर आए जब बीजेपी के लोगों ने उन्हें कांग्रेसी माना और कांग्रेसियों ने उन्हें भाजपाई समर्थक माना । कभी उन्हें जनवादी पत्रकारिता के कारण वामपंथी समझा गया तो कभी समाजवादी । मेरे साथ भी पिछले पैंतालीस बरस में कई बार ऐसा हुआ है । एक अच्छे पत्रकार की यही पहचान है कि वह निष्पक्ष रहे और किसी सियासी वैचारिक धारा से न जुड़े ।

उम्मीद करता हूं कि प्रेस क्लब ऑफ इंडिया अब अपनी रचनात्मक सार्थकता सिद्ध करेगा । इन दिनों इस क्लब की छबि एक बार कम भोजनालय की होती जा रही है । बेशक कुछ अच्छे क़दम भी बीते दिनों उठाए गए हैं । मगर भाई उमा जी इसे एक नाविक की तरह छबियो के झंझावात से निकालकर एक पेशेवर स्वरूप प्रदान करेंगे । उनकी टीम में उपाध्यक्ष शाहिद भाई तथा महासचिव विनय कुमार जैसे अनुभवी चेहरे हैं । इस टीम को मेरी शुभकामनाएं और सभी विजयी प्रत्याशियों को मुबारकबाद ।

राजेश बादल / वरिष्ठ पत्रकार, तीन दशक से ज्यादा वक्त से पत्रकारिता जगत में सक्रिय। आजतक, राज्यसभा टीवी, वाइस ऑफ इंडिया समेत तमाम टीवी चैनलों में वरिष्ठ भूमिका निभा चुके हैं, देश के चर्चित अखबारों में भी काम कर चुके हैं । इनदिनों स्वतंत्र पत्रकारिता में मशगूल।

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