IAS शाह फैसल को नये कश्मीर में दिखने लगी ‘जन्नत’

IAS शाह फैसल को नये कश्मीर में दिखने लगी ‘जन्नत’

टीम बदलाव

नया कश्मीर अब घाटी के उन युवाओं में भी उम्मीद जगाने लगा है, जो धारा 370 हटने के बाद बाग़ी हो गए थे, ऐसे ही बाग़ियों में एक नाम शाह फ़ैसल का भी रहा. ये नाम ना तो जम्मू कश्मीर के लिए नया है, ना ही हिन्दुस्तान के लोगों के लिए, वो जम्मू कश्मीर के पहले यूपीएससी टॉपर हैं, दस साल तक उन्होंने कश्मीर के एडमिनिस्ट्रेशन को क़रीब से देखा, जाना-समझा. शाह फैसल साल 2009 में कश्मीरी युवाओं के आइकन बन गए थे, तब केंद्र में मनमोहन सिंह की सरकार थी. 2014 में मोदी ने देश की कमान संभाली तब भी शाह फैसल घाटी में थे, लेकिन कुछ लोगों ने उनके ज़ेहन में ज़हर भरना शुरू कर दिया.

केंद्र की मोदी सरकार ने कश्मीर के लिए कुछ अच्छे कदम उठाए, कुछ अच्छी रणनीति बनाई लेकिन शाह फैसल की आँखों पर किसी ने मानो पट्टी बांध दी थी, जब धारा 370 हटाने का ऐलान हुआ तो उन्होंने आईएएस की नौकरी ये कहते हुए छोड़ दी कि ये जम्मू-कश्मीर के इतिहास और पहचान पर अटैक है… उन्हें तब कश्मीर में अचानक डर, हताशा और निराशा दिखने लगी थी. अब वही आईएएस फैसल अपने उन आठ महीनों की सोच को लेकर अफ़सोस ज़ाहिर कर रहे हैं. देश से माफ़ी माँग रहे हैं.

शाह फैजल ने लिखा है- “जनवरी 2019 से अगस्त 2019 के आठ महीनों में मैं टूट गया था। मैंने लगभग सब कुछ खो दिया, जो मैंने कईं सालों की मेहनत से बनाया था, चाहे वो नौकरी हो, दोस्त हो या प्रतिष्ठा हो। मेरे आदर्शवाद ने मुझे निराश किया है, लेकिन मैंने उम्मीद नहीं खोई. मुझे अपने आप पर विश्वास है कि मैंने जो गलतियां की थीं, उन्हें सही करूंगा। जीवन मुझे एक और मौका देगा। मैं बीते हुए 8 महीनों को पूरी तरह से मिटाना चाहता हूं।असफलताएं हमें मजबूत बनाती हैं।मैं 39 साल का हो गया हूं और नई शुरुआत के लिए उत्साहितहूं।“

27 अप्रैल को शाह फैसल की ट्वीटर टाइम लाइन पर एक के बाद एक कई ट्वीट नज़र आए, जो एक बड़े बदलाव का संकेतदेर हे थे. ये उसी शाह फैसल की टाइम लाइन थी, जिन्हें तीन साल पहले देश में इन टॉलरेंस नज़र आ रहा था. जिन्होंने सरकारी नौकरी छोड़कर जम्मूकश्मीर पीपुल्स मूवमेंट पार्टी बनाकर राजनीति शुरू कर दी थी.. धारा 370 हटाने के बाद घाटी में विरोध बढ़ा तो उमर अब्दुल्ला, महबूबा मुफ़्ती जैसे नेता नज़रबंद किए गए.. शाह फैसल की गिरफ़्तारी हुई… ये वो दौर था, जिसे शाह फैसल अब याद नहीं करना चाहते.  वो अब ज़िंदगी में एक नया मौक़ा चाहते हैं और कश्मीर एडमिनिस्ट्रेशन में वापसी से ये मौक़ा उन्हें नसीब हो गया है… घाटी के युवाओं के लिए शाह फैसल की ये वापसी एक ब ड़ा पैग़ाम है. कश्मीर में अभी राष्ट्रपति शासन है.  ज़ाहिर है मोदी-शाह की क्लीन चिट के बग़ैर कोई फ़ैसला नहीं हो सकता.  दो कदम शाह फैसल वापस लौटे तो दो कदम सरकार ने भी आगे बढ़ाया है.  शाह फैसल की ज़ुबान पर बदलते कश्मीर के कसीदे हैं,  शाह-मोदी के भाषण उन्हें पसंद आर हे हैं … कश्मीर में हिन्दुओं पर हो रहे हम लोंकाविरोध है. अटल बिहारी वाजपेयी ने जिस कश्मीरियत की बात की थी, वो फलसफा शाह फैसल को समझ आ गया है.

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