रुकतापुर- विकास की आंकाक्षा का ‘चलतापुर’

रुकतापुर- विकास की आंकाक्षा का ‘चलतापुर’

नीलू अग्रवाल

रुकतापुर एक रिपोर्टर की ऐसी डायरी है जो कोशी- सीमांचल में घूमते हुए देखे -अनदेखे, सुने – अनसुने,वहां के सभी तथ्यों को हमारे सामने प्रस्तुत करता जाता है। बकौल लेखक आजादी के तिहत्तर सालों में बिहार को पैंतालिस सालों की स्थाई सरकार मिली बावजूद इसके ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स के आखिरी पायदान पर अगर यह राज्य झूल रहा है तो सवाल तो बनता है! दिखावे के इस युग में जहां हर जगह बनावटीपन है, बिहार राज्य को भी चमचमाती सड़कों, शॉपिंग मॉल, फ्लाईओवर आदि का मुखौटा पहना दिया गया है मगर इसके पीछे की अंधेरी दुनिया नीतीश कुमार के पंद्रह सालों के शासन का सच बयां करती हैं।

आठ अध्यायों और रोचक शीर्षकों में विभक्त पुष्यमित्र के रुकतापुर को बिना रुके पढ़ा जा सकता है। वे हर उस जगह को रुकतापुर कहते हैं जहां विकास का पहिया रुक-सा गया है। इस पुस्तक में लेखक कोशी- सीमांचल से जुड़ी जनजीवन की पुरानी पटरियों की पड़ताल करते दिखते हैं जिनके बीच एक भी बोल्डर सही सलामत नहीं है और इसके रखवाले ऐसे हैं कि गाड़ी की चेन खींच – खींच कर इसे रुकतापुर बना डाला है। यात्रीगण अपनी रिस्क पर यात्रा करें तो करें। रोचक अंदाज में इस प्रदेश की विकट समस्याओं की आंकड़ों के साथ प्रस्तुति आपको बोझिल होने नहीं देती बल्कि चेताती है।

यहां के किसान, मजदूर, दस्तकार, विद्यार्थी हों या उद्यमी, सभी सरकारी कुव्यवस्था की मार झेल रहे हैं। दम तोड़ते आत्मनिर्भर भारत की तस्वीर यहां देखी जा सकती है। जहां प्रचुर खनिज संसाधन और सस्ते मजदूर हों, जहां उद्योगों के पनपने की बेहतर संभावना हो उस राज्य में अगर हर दो में से एक परिवार किसी न किसी वजह से पलायन कर रहा है तो इसका कारण सरकारी सदिच्छा की कमी ही कही जाएगी। यहां लालू जी ने सामाजिक बदलाव के नाम पर उच्छृंखलता और हिंसा को बढ़ावा दिया और नीतीश जी सुशासन का लबादा ओढ़कर इसे खोखला किए जाते हैं। किसी भी प्राकृतिक आपदा से बचाव का अभियान जहां सरकारी जलसे में बदल जाए वहां लंबी दिखती तैयारी के बावजूद जनता का असहाय रह जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं।

कोसी की बाढ़ ऐसी जब्बर है कि हवाई सर्वे, राहत अभियान, पत्रकारों की खबरों तथा विश्लेषण और विद्वानों के सभा – सेमिनारों के बावजूद बढ़ती ही जाती है। इसके कारणों की पड़ताल पुष्यमित्र करते हैं। नदियों को जो तटबन्ध तोहफे में दिए जाते हैं असल में वही उसे बीमार और पूरे राज्य को बाढ़ प्रभावित करते हैं। यह जानने के बाद भी सरकार तटबंधों के निर्माण पर रोक नहीं लगा रही।लेखक ऐसे लोगों के दुखों का अनुमान लगाने की कोशिश करते हैं जिनके घर पिछले पैंतालिस सालों में चौदह-पंद्रह बार नदी की धाराओं की बलि चढ़ चुके हैं।

दूरदर्शिता की यहां इतनी कमी रही कि प्राकृतिक संपदा को नष्ट कर इसकी जगह कंक्रीट के जाल को विकास समझ लिया गया। ‘पग – पग पोखर’ वाले दरभंगा और उसके आसपास के क्षेत्र के भू – माफियाओं की चपेट में आने से यहां के तालाबों की अकाल मृत्यु सूखे का सबब बन चुकी है फिर भी सरकार असंवेदनशील बनी हुई है। तीन ओर से पहाड़ों से घिरे अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन स्थल गया और उसके आसपास के क्षेत्र की पारंपरिक जल संग्रहण व्यवस्था को अवैज्ञानिक नीतियों ने ध्वस्त कर दिया है। नतीजतन वहां के लोग जहरीला पानी पी कर मृत्यु की तरफ बढ़ रहे हैं।

इसी प्रकार यह बात आपके कलेजे को जरूर चुभेगी कि मुजफ्फरपुर में तो बच्चों के मरने का मौसम है और नीतीश बाबू स्वास्थ्य के हालात सुधारने के बजाय बेडों की संख्या बढ़ा रहे हैं। बेटियों की तस्करी, पैक्स का भ्रष्टाचार, लघु उद्योग जैसे, महिषी की बटन फैक्ट्री हो या फोड़ियों (मखाना तैयार करने वाले) के प्रति सरकारी उदासीनता, बदलते बिहार के स्लोगन के साथ शुरू हुई गौरव लग्जरी की बस सेवा का पांच वर्ष में दम तोड़ना जैसे उद्योग विरोधी रवैये सुशासन की कलई खोलने के लिये पर्याप्त हैं। बिहार में जमीन से जुड़ी अदालतों में दौड़ते हुए भूमिहीनों को अगर नौ जन्म भी लग जाए तो कोई बड़ी बात नहीं होगी क्योंकि यहां दबंगों के आगे सरकार ही बेबस है।

कोशी -सीमांचल के साथ-साथ पूरे बिहार को समेटते हुए लेखक परत -दर – परत यहां की समस्याओं के जख्मों को दिखाता और बीमारी का नाम भी बताता जाता है। तब भी अगर सरकार रूपी डॉक्टर इसका इलाज न करे तो आप इसे क्या कहेंगे!
कोशी – सीमांचल और बिहार ही नहीं संपूर्ण भारत से जुड़े लोगों और उनकी सरकारों को यह पुस्तक जरूर पढ़नी चाहिए ताकि वे पड़ताल कर सकें कि बिहार में कहां-कहां रुकतापुर बनता जा रहा है ।

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नीलू अग्रवाल। नीलू ने हिंदी साहित्यसे एमए और एमफिल की पढ़ाई की है। पटना यूनिवर्सिटी से ‘हिंदी के स्वातंत्र्योत्तर महिला उपन्यासकारों में मैत्रेयी पुष्पा का योगदान’ विषय पर शोध कार्य।

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