चुनाव कामरेड कन्हैया लड़ रहे हैं, भगवान परशुराम नहीं !

चुनाव कामरेड कन्हैया लड़ रहे हैं, भगवान परशुराम नहीं !

राकेश कायस्थ

सोशल मीडिया पर सक्रियता के जो साइड इफेक्ट हैं, उनमें आपका ना चाहते हुए रियेक्रशनरी होना जाना भी शामिल है। आखिर ट्रेंड कर रहे हर मुद्धे पर आपका बोलना या लिखना ही ज़रूरी क्यों है? मैने एक बार कहा था कि ये खेल क्रिकेट टेस्ट मैच जैसा है, जहां कई बार शॉट खेलने से ज्यादा अहमियत बॉल छोड़ने की होती है।
कई सवालों पर मेरे पास कहने को बहुत कुछ होता है, फिर भी लिखने से बचता हूं। आखिर निठल्ले चिंतन से ज्यादा ज़रूरी गम-ए-रोजगार है। लेकिन कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिन्हे आप लगातार नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते हैं। छात्र राजनीति से संसदीय चुनाव की तरफ कदम बढ़ा रहे कन्हैया कुमार की लोकसभा की उम्मीदवारी एक ऐसा ही सवाल है।

सोशल मीडिया पर भयंकर विलाप चल रहा है। डर है कहीं ये आंसू वोट पड़ने से पहले ही बेगूसराय में बाढ़ ना ले आयें। कन्हैया कुमार चुनाव देश की एक बेहद पुरानी पार्टी सीपीआई के टिकट पर लड़ रहे हैं। लेकिन सोशल मीडिया से पता चला है कि कन्हैया कुमार ने हंसिया हथौड़ा फेंक दिया है और परशुराम बनकर फरसा उठा लिया है। ठोको ताली, पीटो छाती, ब्रेकिंग न्यूज़।  कन्हैया कुमार भूमिहार हैं।
जब जेएनयू का हंगामा चल रहा था, तब मैं कन्हैया कुमार को दलित या ओबीसी मानकर चल रहा था। आखिर बिहार-यूपी के ज्यादातर गरीब-गुरबा जेएनयू में ही पढ़ने आते हैं। लेकिन भाई लोगों ने जाति खोज निकाली, उसी तरह जिस तरह अजित डोभाल ने ढूंढकर बताया था कि रोहित वेमुला दलित नहीं ओबीसी है। हाय रे कन्हैया कुमार, तू तो भूमिहार निकला! अब निकल गया तो निकल गया। दोबारा दलित या ओबीसी बनकर आ सकता नहीं, तो फिर क्या करे, चुनाव ना लड़े? जाति विनाश के पूरे विमर्श का केंद्रीय तत्व यही है कि जन्म महज एक संयोग है। यह बात रात-दिन जपने वाले भी जब किसी सवर्ण की जाति ढूंढ लाते हैं और उसे नाम के आधार पर जातिवादी टैग करने की कोशिश करते हैं, तो समझ नहीं आता क्या कहूं! यह उसी ब्राहणवादी सोच का एक्सटेंशन है, जिसका विरोध करने का दावा किया जाता है।

किसी सवर्ण को उसके जन्म के आधार पर जातिवादी बता देना कुछ वैसी ही मानसिकता है, जैसे किसी लड़की के कपड़े देखकर उसे कैरेक्टर सार्टिफिकेट देना। अगर मुसलमान है तो देशद्रोही और भूमिहार है तो जातिवादी! आखिर इन दोनों बातों में फर्क क्या है? सोचिये और तय कीजिये कि आप तर्क के किस धरातल पर खड़े हैं। ऐसा नहीं है कि कन्हैया से मुश्किल सवाल नहीं पूछे जा सकते। यकीनन उनसे यह पूछा जाना चाहिए कि आपने जय भीम और लाल सलाम के नारे के साथ आपने अपनी राजनीति शुरू की है, तो ये भी बता दीजिये कि आपकी पार्टी में जय भीम वालों की स्थिति क्या है?

यह सच है कि भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों का चरित्र शुरू से इलीट रहा है, इसलिए इन पार्टियों के शीर्ष पर हमेशा से सामाजिक संरचना में सबसे उपर रही जातियों के लोग रहे हैं। लेकिन कन्हैया कुमार ना तो सीपीआई पोलित ब्यूरो के मेंबर हैं और ना ही कोई बड़े नेता। छात्र राजनीति के ज़रिये उन्होंने अपनी जो पहचान बनाई है, उसकी वजह से मजबूर होकर सीपीआई को उन्हें टिकट देना पड़ा है।
फिर कन्हैया को भूमिहार ब्रांड करने की इतनी बेचैनी क्यों है? हमें याद रखना होगा कि सार्वजनिक विमर्श कई बार निजी कुंठाओं की वजह से भी गढ़े जाते हैं। कन्हैया को लेकर भी वही ईर्ष्या काम करती है, जो रवीश कुमार को लेकर है। बोंसाई बुद्धिजीवियों की प्रजाति चाहती है, सिर्फ हम ही हम हों, दूजा कोई नहीं। इतने बड़े देश में यह संभव नहीं है। ऐसे लोग उस बहुजन विमर्श को छिछला बना रहे हैं, जिसकी अपनी एक स्वभाविक वैचारिक ताकत रही है।

कन्हैया की जाति को लेकर माथा-पीटने से बेहतर यह है कि आरजेडी उम्मीदवार के पक्ष में खुलकर प्रचार कीजिये। यह बताइये कि वे किस तरह कन्हैया कुमार या गिरिराज सिंह से बेहतर है। चरित्र हनन और दुष्प्रचार से कुछ नहीं होगा। राजनीति में पहले कीचड़ बहुत ज्यादा है।  सबसे दिलचस्प तर्क यह दिया जा रहा है कि कन्हैया बेगूसराय से चुनाव इसलिए लड़ रहे हैं क्योंकि वहां पांच लाख भूमिहार हैं। एक पूरे समुदाय को जातिवादी बता देना उतना ही असंगत है, जैसे किसी धार्मिक समुदाय को आतंकवादी या जनजातीय समुदाय को चोर बताना। अलग-अलग समूहों के लिए तर्क के पैमाने अलग-अलग नहीं हो सकते हैं। चलिये एक बार यह मान भी लें कि सारे भूमिहार आंख मूंदकर जाति के नाम पर वोट देते हैं। फिर तो आपको खुश होना चाहिए क्योंकि सामने दूसरे भूमिहार गिरिराज सिंह है, वोटों को बंटवारा होगा और जाति-धर्म से परे नैतिकता के चरम पर खड़ी आपकी आरजेडी आराम से जीत जाएगी। लेकिन आप फिर भी रोये जा रहे हैं।

सभी रूदाली बंधुओं से मेरा अनुरोध है कि कन्हैया की उम्मीदवारी अगर राष्टव्यापी संकट है तो फिर उसकी हार सुनिश्चित करने के लिए बेगूसराय में कैंप करें। फेसबुक पर रो-धोकर नाहक अपना टाइम बर्बाद कर रहे हैं और मुझसे यह सब लिखवाकर मेरा वक्त भी बर्बाद करवा रहे हैं।


राकेश कायस्थ।  झारखंड की राजधानी रांची के मूल निवासी। दो दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय। खेल पत्रकारिता पर गहरी पैठ। टीवी टुडे,  बीएजी, न्यूज़ 24 समेत देश के कई मीडिया संस्थानों में काम करते हुए आप ने अपनी अलग पहचान बनाई। इन दिनों एक बहुराष्ट्रीय मीडिया समूह से जुड़े हैं। ‘कोस-कोस शब्दकोश’ और ‘प्रजातंत्र के पकौड़े’ नाम से आपकी किताब भी चर्चा में रही।

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