पेरियार के आँगन में बहती रही कोसी की धारा

पेरियार के आँगन में बहती रही कोसी की धारा

पुष्यमित्र

मुझे यह मालूम नहीं था कि पेरियार एक नदी का नाम है जो भारत के दक्षिणवर्ती राज्य केरल में बहती है। मैं यही समझता था कि तमिलनाडु के महान नेता पेरियार के नाम पर ही जेएनयू के पेरियार छात्रावास का नाम रखा गया है। जेएनयू की एल्युमिनी और शुक्रवार रात के आयोजन की संचालक सविता झा ने मुझे करेक्ट करते हुए कहा कि यह भी नदी का नाम ही है। जेएनयू में छात्रावासों के नाम नदियों के नाम पर ही रखे गए हैं। बाद में मैंने गूगल किया तो उनकी बात सच साबित हुई।

तो शुक्रवार की रात 9 बजे से मैं जेएनयू के पेरियार छात्रावास के मेस में ही था। बाहर का तापमान 7 या 8 डिग्री था। पास वाली दुकान के पास छात्र-छात्राएं टहल रहे थे। कुछ लोग लकड़ी जला कर आग ताप रहे थे। मेस में खाना खत्म होने के बाद बिहार के पूर्वोत्तर इलाके में बहने वाली नदी कोसी पर लिखी गयी किताब ‘रेडियो कोसी’ पर होने वाली परिचर्चा की तैयारी की जा रही थी। और इस पुस्तक का लेखक थोड़ा भयभीत था, क्योंकि देश के इस जानेमाने विश्वविद्यालय के तीन प्रोफेसर उसकी पहली किताब पर अपनी राय जाहिर करने वाले थे और वहां के छात्रों के पास कई तरह के सवाल थे। संचालक सविता झा ने जो आयोजक भी थीं, चर्चा के विषय को कोसी नदी की समस्या से जोड़ दिया था और जब तक आयोजन शुरू होता छात्र सवाल करने लगे थे कि कोसी नदी को बिहार का शोक क्यों कहा जाता है। सवाल करने वाले छात्र भूगोल के थे।

जब तीनों विद्वान प्रोफेसर डायस पर बैठे तो मैंने देखा कि किताब के पन्ने जगह जगह रंगे हुये हैं और किनारे से कई पन्ने मोड़े गये हैं। यानी किताब को अच्छी तरह पढ़ा गया था और लेखक सोच रहा था कि उसकी चतुराई और उसकी कमजोरी उन प्रोफेसरों की निगाह में आ गयी होगी। प्रूफ की गलतियों की वजह से मन पहले से ही भयभीत था। ये प्रोफेसर कोई आम प्रोफेसर नहीं थे। प्रो मणीन्द्र नाथ ठाकुर समाजशास्त्री के रूप में पूरे देश में जाने जाते हैं। वे इन दिनों देश की पौराणिक और पारंपरिक कथाओं में राजनीति और समाजशास्त्र के सिद्धांतों को तलाशने और देश की मौजूदा परिस्थितयों का हल उसके जरिये ढूँढने में जुटे हैं। देव शंकर नवीन ने हाल ही में देश के सबसे विद्रोही लेखक राजकमल चौधरी की वृहद रचनावली का संपादन किया है। वे खुद भी अच्छे लेखक हैं और नेशनल बुक ट्रस्ट में संपादक रह चुके हैं। प्रो देवेन्द्र चौबे ग्रामीण परिवेश को समृद्ध करने को लेकर लगातार काम कर रहे हैं।

भय की एक और वजह थी कि प्रो मणीन्द्र नाथ ठाकुर और प्रो देव शंकर नवीन उसी इलाके से हैं जहां की पृष्ठभूमि पर यह उपन्यास आधारित है। दोनों ने नदियों और तटबंधों की समस्या को मुझसे काफी अधिक गम्भीरता से समझा है और प्रो ठाकुर ने तो इस मसले पर अच्छा खासा संघर्ष भी किया है। मैं अपनी पुस्तक को एग्जाम में लिखी गयी कॉपी की तरह देख रहा था जिसकी इन प्रोफेसरों ने पूरी गंभीरता से जाँच की है और अब उसका रिजल्ट आना था।

शुरुआत प्रो ठाकुर से हुई। चूँकि वे इन दिनों पंचतंत्र, बेताल पचीसी जैसी कथाओं को देश की राजनीतिक परिस्थितियों को दिशा देने की संभावनाओं के आधार पर परख रहे हैं, इसलिये उन्होंने इस किताब को भी उसी निगाह से देखा। उन्होंने कहा कि इस उपन्यास में तटबंध, उसकी राजनीति और भ्रष्टाचार को तो अच्छी तरह समझा ही गया है, पंजाबी युवती और बिहारी युवक के प्रेम और पंजाबी युवती के कोसी के परिवेश में आकर उसे बदलने की कोशिश करना भी बहुत पसंद आया। वे चाहते हैं कि इस तरह की खूब शादियां हों ताकि इस पिछड़े इलाके के सामाजिक परिवेश में भी सकारात्मक बदलाव आये। उपन्यास का अंत उन्हें खास तौर पर पसंद आया। हालाँकि उन्होंने इस उपन्यास में लोक स्मृतियों और सामाजिक परिवेश के वर्णन के अभाव की बात की और कहा कि अगर ये चीजें होतीं तो उपन्यास और समृद्ध होता।

प्रो देवशंकर नवीन ने कहा कि कोसी की समस्या और वहां की राजनीति का मसला शाश्वत है। लेखक ने रेडियो कोसी की फैंटेसी रचकर उसे रोचक बनाने की कोशिश की है ताकि लोग नये सिरे से इस मसले पर विचार कर सकें। उन्होंने दीपा और प्रह्लाद के प्रेम के अंकुरित होने वाले प्रसंग को भी खास तौर पर याद किया। दीपा के चरित्र की मजबूती की सराहना की, जब वह आखिर में डीएम से कहती है कि हमलोग को मरने दीजिये। हम जिन्दा भी कहाँ हैं। आपको हमारे मौत की कम अपना कैरियर रिकॉर्ड ठीक रखने की अधिक फ़िक्र है। उन्होंने भी यह इशारा किया की उपन्यास को और विस्तार दिया जाना चाहिये थे।

प्रो चौबे ने हालाँकि शुरुआत में ही स्वीकार कर लिया कि उन्होंने उपन्यास पूरी तरह पढ़ा नहीं है मगर जितने पन्ने उन्होंने पढ़े हैं वह इस उपन्यास को पढ़ने के लिये उन्हें आकर्षित करते हैं। सबसे दिलचस्प बात यह हुई कि अपने व्याख्यान के दौरान तीन प्रोफेसर कोसी, बिहार की दूसरी नदियों, तटबंधों और ऐसे मसलों से सम्बंधित अपनी याद में डूब गये। उन्होंने कई ऐसे प्रसंग सुनाये जो इस उपन्यास के मुद्दे को व्यापकता दे रहे थे। जैसा कि कार्यक्रम की संचालक सविता झा ने पहले ही कहा था चर्चा का मुद्दा सिर्फ उपन्यास ही नहीं बल्कि कोसी, नदियां, तटबंध और पर्यावरण की ओर स्वतः केंद्रित हो गया।

इस भीषण ठण्ड में आयोजन में जुटे छात्र-छात्राओं और बाहर से आये श्रोताओं ने बीच-बीच में और व्याख्यान के बाद में भी कई जरूरी सवाल किये और उनकी टिप्पणियों ने बहस की रोचकता को बरकरार रखा। लेखक को भी कुछ कहने का मौका मिला, मगर वह तो सुनने आया था। इस बहस को सुनकर उसने महसूस किया कि उसका श्रम सार्थक हुआ है। एक बहस शुरू हुई है। प्रकाशक अरुणचंद्र राय ने भी अपनी टिप्पणी पेश की। आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले अमित आनंद तस्वीरें लेते रहे और वीडियो बनाते रहे। पेरियार के आँगन में रात 11.30 बजे तक कोसी की धारा बहती रही। जब हम लौट रहे थे तो ऐसा लग रहा था हम सब थोड़े समृद्ध होकर लौट रहे हैं।


पुष्यमित्र। पिछले डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय। गांवों में बदलाव और उनसे जुड़े मुद्दों पर आपकी पैनी नज़र रहती है। जवाहर नवोदय विद्यालय से स्कूली शिक्षा। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता का अध्ययन। व्यावहारिक अनुभव कई पत्र-पत्रिकाओं के साथ जुड़ कर बटोरा। संप्रति- प्रभात खबर में वरिष्ठ संपादकीय सहयोगी। आप इनसे 09771927097 पर संपर्क कर सकते हैं।

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