आलोक श्रीवास्तव की दो कविताएं

आलोक श्रीवास्तव की दो कविताएं

एक दिन आएगा

एक दिन आएगा
जब तुम जिस भी रास्ते से गुजरोगी
वहीं सबसे पहले खिलेंगे फूल
तुम जिन भी झरनों को छुओगी
सबसे मीठा होगा उनका पानी
जिन भी दरवाजों पर
तुम्हारे हाथों की थपथपाहट होगी
खुशियां वहीं आएंगी सबसे पहले
जिस भी शख्स से तुम करोगी बातें
वह नफरत नहीं कर पाएगा
फिर कभी किसी से
जिस भी किसी का कंधा तुम छुओगी
हर किसी का दुख उठा लेने की
कूवत आ जाएगी उस कंधे में
जिन भी आंखों में तुम झांकोगी
उन आंखों का देखा गर कुछ
वसंत का मौसम होगा
जिस भी व्यक्ति को तुम प्यार करोगी
चाहोगी जिस किसी को दिल की गहराईयों से
सारे देवदूत शर्मसार होंगे उसके आगे

चैत्र के ठीक पहले
पत्रहीन हो गए पलाश-वृक्षों पर
जैसे रंग उतरता है
ऋतु भीगती है भोर की ओस में
वैसे ही गुजरोगी तुम एक दिन
हमारी इच्छाओं, दुखों और स्वप्नों के बीच से

एक दिन आएगा
जब हम दुखी नहीं होंगे तुम्हें लेकर
तुम्हें दोष नहीं देंगे
उम्मीदें नहीं पालेंगे
पर, सचमुच तुम्हें चाह सकेंगे
तुम भी महसूस कर सकोगी
हमारे प्यार का ताप।

एक विद्रोही स्त्री

बिहार के प्रसिद्ध चित्रकार राजेंद्र प्रसाद गुप्ता की कृति। साभार- उनके फेसबुक वॉल से।

इस समाज में
शोषण की बुनियाद पर टिके संबंध भी
प्रेम शब्द से अभिहित किए जाते हैं
एक स्त्री तैयार है मन-प्राण से
घर संभालने, खाना बनाने कपड़ा धोने
और झाड़ू-बुहारु के लिए
मुस्तैद है पुरुष उसके भरण पोषण में
हां बिचौलिए के जरिए नहीं
एक दूसरे को उन्होंने खोजा है
और इसे वे प्यार कहते हैं

और मुझे वेरा याद आती है
उसके सपने याद आते हैं
शरीर का अतिक्रमण करती एक विद्रोही स्त्री
उपन्यास के पन्नों से निकल कर
कभी कभी किसी शहर में किसी रास्ते पर दिखती है
विद्रोही पुरुष भी नजर आते हैं गुस्से से भरे हुए
राज्य के विऱुद्ध, समाज के विरुद्घ
परंपरा और अन्याय के विरुद्ध
मित्रो, शक नहीं है इन पुरुषों की ईमानदारी पर
विद्रोह पर, क्रांतिकारी चरित्र पर
किंतु रोजमर्रा की जिंदगी की तकलीफों के आगे
वे अक्सर सामंत ही साबित होते हैं
बहुत हुआ तो थोड़ा भावुक किस्म के, समझदार किस्म के
मगर सामंत
फिर हम अंत देखते हैं करुणा और विषण्ण-
एक विद्रोही स्त्री का
समाज अपनी गुंजलके कसता चला जाता है उसके गिर्द
जीवन के इन सारे रहस्यों के आगे
यह आधुनिक-पुरुष-प्रेमी लाचार होता चला जाता है
फिर भी अंत तक वह विद्रोही रहता है
समाज को बदलने में संलग्न
और एक विद्रोही स्त्री खत्म हो जाती है
उसके विद्रोह के निशान भी नहीं बचते
उसके ही चेहरे पर।


आलोक श्रीवास्तव। पत्रकार, कवि और चिंतक। मेरठ के निवासी आलोक श्रीवास्तव ने दिल्ली, मुंबई, जयपुर समेत कई शहरों में रहकर पत्र-पत्रिकाओं में लंबे वक्त तक काम किया। धर्मयुग, अमर उजाला, नवभारत टाइम्स जैसे अखबारों से संबद्ध रहे। अहा! ज़िंदगी का संपादन किया। पत्रकारिता में हो रहे बदलावों पर आपकी पैनी नज़र रही है। 

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