ब्रह्मलीन पिता का शब्दों के जरिये साक्षात्कार

ब्रह्मलीन पिता का शब्दों के जरिये साक्षात्कार


पशुपति शर्मा के फेसबुक वॉल से

क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात
कहे रहीम का घटयौ, जो भृगु मारे लात!
पापा के जीवन का अनकहा सूत्र मँत्र यही रहा। क्षमा हर किसी के लिए, हर वक्त। शायद यही वजह भी रही कि इतने बड़े कुनबे को जोड़े रखने में समर्थ हो सके। रहीम के कहे मुताबिक प्रेम के रिश्तों में उन्होंने गांठें कम ही पड़ने दी।

पिता अनंत, पिता कथा अनंता-2
पापा ने रहीम को साधा और दिनकर को चुनौती देते रहे।
क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो
उसको क्या जो विषहीन, विनीत सरल हो

इन पंक्तियों के विपरीत पापा अपने विनय , सरल भाव से घर, परिवार, समाज में क्षमा साधना करते रहे, अपने परिवेश को विषहीन, जहरमुक्त बनाते रहे।कई बार खयाल आया अपने अंतर्मन में बसे हरि-पापा को शब्दों में बयां करने की जरूरत क्या है। ब्रह्मानंद सर ने पापा को याद करते हुए फोन किया। उन्होंने कहा- सब भूल जाते हैं कुछ दिनों में। सच ही तो है। फिर सोचा, शब्द ब्रह्म है और ब्रह्मलीन पिता का शब्दों के जरिये साक्षात्कार कर ही लूं।

पिता अनंत, पिता कथा अनंता। शंभू लाल वर्मा सर ने कहा, ऐसा बाल मन वाला विराट व्यक्तित्व उन्होंने दूसरा नहीं देखा। मेरे मित्रवत भाई मयंक जी ने पिता के स्नेह और भाव विभोर हो उठने की तस्वीर खींची। अरूण, सत्येन्द्र समेत तमाम मित्रों की वेदना का एहसास है। पिता ने अपना स्नेह हम भाई बहनों तक सीमित नहीं रखा, उसे हमारी मित्र मंडली में विस्तार दे दिया।

मेरे कुछ मित्रों से कुछ वक्त का नाता, पर वैसी ही आत्मीयता। राजू, चंदन, भोमल, सोमल के मित्रों से कुछ ज्यादा करीबी, कुछ ज्यादा स्नेह। सच कहूं, मुझे ऐसे व्यक्तित्व हमेशा से प्रभावित करते रहे हैं, जिनके स्नेह के कई कई दावेदार रहे हों, और उस कतार में एक दावेदार मैं भी रहा। ऐसे ही मेरे गुरु बंसी दा थे, जिनकी स्नेह की कतार में मुझे भी जगह हासिल रही। बंसी दा के शून्य के साथ जिन्दगी में एक और शून्य।

पिता की स्नेहिल विरासत पर बेटों से ज्यादा बड़ा दावा बहुओं ने ठोक रखा है। पिता की डांट फटकार के साथ उन्होंने अपनी सेवा से पिता को खुश होने के अनगिनत अवसर दिए हैं, अनगिनत वजहें दी हैं। पापा ने कुशल कारोबारी की तरह स्नेह, शिकायत, नाराजगी, गुस्से के भावों के जमा खर्च के लिए बेटों का खाता अलग बनाया, बेटी का खाता अलग बनाया, बहुओं का खाता अलग बनाया, नाते-रिश्तेदार का खाता अलग। कभी कोई गड्डमड्ड नहीं, घालमेल नहीं। और हर सुबह पुराना हिसाब शून्य कर नया पन्ना तैयार किया।
क्षमा की निरंतर साधना से मेरे हरि ने खुद को भी निर्मल रखा औरों को भी शीतलता प्रदान की।
कबीर कहते हैं-
भली भली सब कोई कहे
रही क्षमा ठहराय
कहे कबीर शीतल भया
क्षमा जो आग बुझाय।
हे हरि, हे पिता हमें क्षमा करें और हमें भी क्षमा की असीम क्षमता का आशीर्वाद दें।

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