कर्म ही पूजा है, की मिसाल रहे पापा

कर्म ही पूजा है, की मिसाल रहे पापा

पशुपति शर्मा के फेसबुक वॉल से

पिता ने मोह माया का वृहत संसार रचा और खुद निर्मोही रहे। गृहस्थ जीवन में रहते हुए संत साधना। और ये संत स्वभाव पिता को अपने पिताजी से मिला। मेरे दादा, पापा के बाबू।

दादा को हमने जब से देखा, एक अजीब सी ठसक में देखा। धोती की अंटी में चंद रुपये लपेटे वो दुनिया खरीदने का दमखम रखा करते। पिता भी कम न थे। पापा का भी खजाना कभी किसी मौके पर कमतर नहीं पड़ा।

पिता अनंत, पिता कथा अनंता-3

संसार के साथ संत साधना की ये धारा दादा श्री सूर्य नारायण शर्मा से शुरू हुई। दादी यमुना देवी ने उस प्रवाह को सशक्त किया। दादा के बेटों- बैजू, बासुकी और बेटी लक्ष्मी- ने उस धारा को अपने अंतर्मन में बसा लिया। कभी वो धारा प्रबल हुई, कभी वो निर्बल होती दिखी, पर एक सातत्य बना रहा।
कवि प्रमोद तिवारी की कविता इस संदर्भ में-
नदिया धीरे धीरे बहना
गति में है जीवन का शृंगार

जब हम छोटे थे, तब नासमझी में कई बार पापा पर खीजते- आपने इतना धन कमाया, किया क्या? आज थोड़ी बहुत समझ आई तो सवाल की निरर्थकता का एहसास होता है। पापा ने तमाम रिश्ते नाते निभाते हुए लौकिक और अलौकिक दोनों ही अर्थों में जितना कुछ हासिल किया, हर किसी के लिए मुमकिन नहीं।

दादा की आध्यात्मिकता अलग थी, पापा की अलग। दादा महीनों बैजनाथ धाम में बैठे रहते और उनका बैजू मिनटों में हाथ जोड़ कर काम पर निकल जाता। ईश्वर में अगाध आस्था के बावजूद पिता की प्राथमिकता अलग रही। जवानी के दिनों में दादा ने कभी कभी फटकारा, बाद के दिनों में मेरी मां ने कभी उलाहने दिए तो पापा का सरल सा जवाब होता- सारे तीरथ घर में ही हैं।

पापा की आध्यात्मिकता उनके कर्मों में निहित रही। मन चंगा तो कठौती में गंगा का भाव प्रबल रहा। जीवन में जो सहज गति से प्राप्त हुआ, उसे पापा ने पूरी श्रद्धा से ग्रहण किया। कोई बाह्य आडंबर नहीं।

पाहन पूजे हरि मिले तो मैं पूजूं पहार
याते चाकी भली जो पीस खाये संसार।

कबीर का ये कर्मयोग पिता ने साधा। कर्म ही पूजा है, की मिसाल रहे पापा।

मैं अपने पिता, अपने हरि में अपने आदर्श ढूंढता हूं, पाता हूं। आप बचपन से जो देखते हैं, उसका गहरा असर आप पर रहता है। आप कितना भी बदलें, बदलना चाहें, आपके व्यक्तित्व पर पारिवारिक टकसाल की, शुरुआती दिनों की, प्रथम गुरु मां-पिता की छाप रह जाती है।

पिता की इस कथा को मानो पिता के आदेश से ही आप तक पहुंचा रहा हूं। मकसद बस इतना जो हाथ से निकल गया सो निकल गया, अब जो बचा है वो भी सहेज लूं तो पिता के साथ होने का एहसास बना रहेगा।

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