पुरानी यादों के साथ नए सफर पर पशुपति शर्मा

पुरानी यादों के साथ नए सफर पर पशुपति शर्मा

ज़ी हिन्दुस्तान के साथ शानदार सफ़र, जानदार यादें

डर हम को भी लगता है रस्ते के सन्नाटे से
लेकिन एक सफ़र पर ऐ दिल अब जाना तो होगा

  • जावेद अख़्तर

मुसाफिर हूं यारों … सफ़र का अपना आनंद है… आप जब तक सफ़र में हैं ये आनंद बना रहता है… जहां ठहरे… वहीं से रोमांच खत्म… उत्साह खत्म… चुनौतियां खत्म.. आप खत्म… अब तक सफ़र में रहने का आनंद लिया है… अब एक और सफ़र पर निकल रहा हूं…

साथ छोटा ही सही, मायनीखेज होना चाहिए। रिश्ता कुछ दिनों का ही सही, यादें दमदार होनी चाहिए। जुलाई 2020 में जब न्यूज़ रूम में दाखिल हुआ तो ज़ी मीडिया के सीईओ पुरुषोत्तम सर के तूफान से साबका पड़ा… ये वो वक्त था… जब सीईओ सर 24 घंटे जागते रहते… ज़ी हिन्दुस्तान के नए सपने में डूबे रहते… कहते हैं न सपने वो हैं जो आपको सोने न दें… पुरुषोत्तम सर उन दिनों न खुद सो रहे थे और न अपनी टीम को सोने दे रहे थे… हर प्रोग्राम डिफरेंट हो… हर डिबेट डिफरेंट हो… कंटेंट पर पैनी नज़र… स्क्रीन पर पैनी नज़र… सुबह से शाम तक हर छोटी बड़ी बात पर कॉल… ग्रुप में मैसेज… डांट-फटकार और उसके बाद प्यार…. गजब के दिन… और गजब की यादें…

पुरुषोत्तम सर के साथ इस तूफानी पारी ने काफी कुछ सिखाया…. काम करने का काफी मौका मिला… कई प्रयोग किए… बतौर टीम लीडर काफी कुछ सीखा… समझा… खुद को परखा…. ज़ी हिन्दुस्तान की बेहद शानदार टीम… तजुर्बेकार… हुनरमंद… प्रयोगधर्मी… मेरी खुशनसीबी ये रही कि पहले दिन से ही इस पूरी टीम ने अपना लिया…. एंट्री अजनबी की तरह नहीं हुई… ऐसा लगा मानो इस टीम का हिस्सा सालों से हूं… सब ने मिलकर धमाल मचाया… काम करने का मजा आया… सफर में मूंगफली के दाने हम सबने एक ही पॉलीथीन से उठाए… तोड़े… चबाए और ‘कुछ अच्छा हो जाए’ का स्वाद और रस अंतरतम तक घुल गया… सभी का साधुवाद…

इस सफ़र में नींद ऐसी खो गई
हम न सोए रात थक कर सो गई
-राही मासूम रज़ा

नवंबर 2020 में शमशेर सर की एंट्री… एक नए अध्याय की शुरुआत… नई ऊर्जा का संचार… टीम लीडर के तौर पर शमशेर जी ने समोसे-जलेबी के साथ न्यूज़ रूम को नये जायके से रूबरू कराया … ख़बरों में समोसे वाले तेवर और रिश्तों में जलेबी वाली मिठास… शमशेर सर के साथ करीब 8 महीनों की पारी… ये भी एक नया सफ़र… नया एहसास… काफी कुछ सीखा… प्रोफेशनल स्तर पर भी… पर्सनल स्तर पर भी… ‘हार में न जीत में… किंचित नहीं भयभीत मैं…’ वाले तेवर पसंद आए…

ज़िंदगी यूं हुई बसर तन्हा
क़ाफ़िला साथ और सफ़र तन्हा

  • गुलज़ार

मैं खुद को भाग्यशाली मानता हूं कि मैं टॉप बॉस और न्यूज़ रूम के जूनियर साथियों के बीच संवाद की कड़ी बन सका… मैंने न्यूज़ रूम के हर साथी से बहुत कुछ सीखा… हर पल सीखने की कोशिश की… ज़ी मीडिया के हर विभाग से मुझे काम करने के दौरान सहयोग मिला…. आउटपुट से लेकर इनपुट तक…. प्रोडक्शन टीम से गेस्ट टीम तक… सोशल मीडिया से लेकर वेब टीम तक… पीसीआर से कैमरा सैक्शन तक… ग्राफिक्स से एडिटिंग तक… एचआर से एडमिन तक… कमर्शियल से मार्केटिंग तक… हर किसी से संवाद हुआ… साथ मिलकर काम किया… सच कहूं तो सफ़र में बहुत मजा आया…

इस सफ़र में जाने-अनजाने मुझसे गलती हो गई हो… मैंने किसी का दिल दुखाया हो…. किसी की भावनाओं को चोट पहुंचाई हो तो माफ कर दीजिए… सफ़र में जो मुसाफिर वक्फे के लिए साथ आते हैं… बीच रास्ते उतर जाया करते हैं… उन्हें हाथ हिलाकर, मुस्कुरा कर विदा कर देते हैं…. कुछ अच्छी यादें हों तो साथ ले चलते हैं… कुछ बुरी यादें हो तो हाथ हिला कर उसे भी हवा में उड़ा देते हैं…

साथियों… मैं भी… जिंदगी के जंक्शन में अगली गाड़ी पर सवार हो रहा हूं… आपके साथ गुजारी अच्छी यादें साथ हैं…

साथियों… इस मुसाफ़िर को एक मुस्कान के साथ दुआएं देंगे न….

किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल
कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा
-अहमद फ़राज़

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