अखबार के जरिए यथार्थ से जुड़ना, एक मुगालता- आलोक श्रीवास्तव

अखबार के जरिए यथार्थ से जुड़ना, एक मुगालता- आलोक श्रीवास्तव

पशुपति शर्मा

पत्रकारिता में वैश्वीकरण के बाद एक नया बदलाव आया है। वो समाज के बड़े मुद्दों पर बात नहीं करती, समाज सापेक्ष न हो कर वो सिविक समस्याओं पर केंद्रित होती गई है। वो मध्य वर्ग की महत्वाकांक्षाओं का प्रतिबिंब बन कर रह गई। वो मध्यवर्ग जो आयातित वैचारिकी का हिस्सा है। औद्योगिक क्रांति और पूंजीवाद के उदय के साथ यूरोपीय देशों में जो मध्यवर्ग उभरा, उसकी अपनी ऐतिहासिक भूमिका रही। लेकिन भारतीय मध्यवर्ग भारतीय परिप्रेक्ष्य में एक ह्रासशील वर्ग ही बन कर रहा। ये बातें बदलाव की ओर से आयोजित ‘मुसाफिर हूं यारों’ कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार आलोक श्रीवास्तव ने कही।

आलोक श्रीवास्तव ने ‘पल प्रतिपल’ पत्रिका  में मैनेजर पांडेय के एक आलेख का जिक्र करते हुए कहा कि अधिकांश लोगों को ये मुगालता रहा है कि अखबार पढ़ना यथार्थ से जुड़ना है। उन्होंने अखबारों पर बाज़ार और राजनीतिक दलों के प्रभाव का जिक्र करते हुए कि अखबार वक़्त के साथ खास वर्गों के हितों से जुड़ते चले गए। सरकारी विज्ञापनों की वजह से जहां अखबारों का चरित्र बदला वहीं मध्यवर्ग के बीच पहुंचने वाले कार, मोबाइल, टीवी, फ्रिज और बिल्डर्स के विज्ञापनों ने भी कंटेंट के स्तर पर बड़ा दबाव बनाया। उपभोक्ताओं की रुचि की सामग्री, दिलचस्पी के फासले से अखबारों का स्वरूप बदला। बराबरी पर टिके समाज के निर्माण में अखबारों की कोई भूमिका नहीं रह गई।

उन्होंने इस बात पर भी चिंता जाहिर की कि पत्रकारिता में तथाकथित अनुभवी पत्रकारों की जो फौज है, वो पत्रकारिता की जटिलताओं की बुनियादी समझ भी नहीं बना सके हैं। आलोक श्रीवास्तव अपने निजी अनुभवों के साथ पत्रकारिता के तेवरों में आए बदलाव की बात करते रहे। उन्होंने 1989 में अमर उजाला, मेरठ से पत्रकारिता में इत्तफाकन एंट्री ली। 1990 में वो ‘धर्मयुग’ जैसी ब्रांडेड पत्रिका से जुड़े, जो अपने समय में शिक्षित मध्यवर्ग की लोकप्रिय पत्रिका थी। वो ये कबूल करते हैं कि उन्हें बाद में ये पता चला कि ये सारी पत्रिकाएं ‘उजड़ते हुए शामियाने’ की तरह थीं। इसी ऊहापोह के बीच 1996 तक (धर्मयुग के बंद होने तक) वो इसी पत्रिका की संपादकीय टीम का हिस्सा रहे। उन्होंने टाइम्स समूह की उस साज़िश का जिक्र भी किया, जिसके तहत हिंदी प्रकाशनों को चरणबद्ध तरीके से बंद करने का ताना-बाना बुना गया।

आलोक श्रीवास्तव की नजरों में हिंदी पत्रिकाओं के खत्म होने की एक बड़ी वजह ‘मुनाफे के कंस्ट्रेशन’ की सोच रही। बातचीत के सिलसिले में गणेश मंत्री, विश्वनाथ सचदेव, धर्मवीर भारती और वेदप्रताप वैदिक का जिक्र भी आया। आलोक श्रीवास्तव ने बिना किसी लाग-लपेट के इन सभी की चारित्रिक, संपादकीय खूबियों और खामियों का जिक्र किया। टाइम्स समूह और चंद्रप्रभा प्रकाशन की आपराधिक सांठगांठ के खिलाफ अपनी कानूनी लड़ाई और उसमें मिली जीत के बारे में बताते हुए उन्होंने न्याय व्यवस्था की सड़ांध भी सामने रखी।

2010 में आलोक श्रीवास्तव ने एक बड़ा कदम उठाया और नवभारत टाइम्स को अलविदा कह दैनिक भास्कर की साहित्यिक-सांस्कृतिक मासिक पत्रिका ‘अहा! ज़िंदगी’ के संपादन की जिम्मेदारी संभाली। 2016 तक करीब 6 साल के दौरान उन्होंने इस पत्रिका के जरिए वृहत्तर पाठक समाज से संवाद बनाया और उनकी अभिरुचियों का विस्तार करने की कोशिश की। पत्रिकाओं को लेकर आलोक श्रीवास्तव का मानना है कि त्वरित संचार माध्यमों के बीच उन्हें अपना वजूद तलाशने और बनाए रखने के लिए नए प्रयोग करने होंगे। प्रस्तुति, कंटेंट और सर्कुलेशन तीनों ही स्तर पर स्ट्रेटजी बनानी होगी, तभी कोई पत्रिका कामयाब हो सकती है।

बातचीत के संयोजन की भूमिका जूली जयश्री ने निभाई। इस छोटी गोष्ठी में मोहन जोशी, अवधेश सिंह ने अपने सवालों से आलोक श्रीवास्तव को कुरेदा। आलोक श्रीवास्तव ने सभी राजनीतिक दलों की सीमाओं का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि लेफ्ट पार्टियां रूस और चीन के राष्ट्रवाद की मानसिक गुलामी से नहीं उबर पाईं। इन पार्टियों ने भारतीय परिप्रेक्ष्यय में अपनी भूमिका का आकलन ठीक ढंग से नहीं किया। कांग्रेस की समस्या को उन्होंने परिवारवाद से परे वैचारिक पतन के तौर पर रेखांकित किया। आम आदमी पार्टी के उभार को उन्होंने नागरिक समाज के नेतृत्व के तौर पर देखा तो जरूर लेकिन अरविंद केजरीवाल की महत्वाकांक्षा में इस दिल्ली तक सीमित कर दिए जाने पर अफसोस भी जाहिर किया। मौजूदा सत्तारूढ दल को लेकर उन्होंने लक्षणा में अपनी बात कही- एबसोल्यूट आदर्श और सत्य का प्रयोग करने वाले बेहतर लोग होते हैं और इसकी डिमांड करने वाले सबसे ज्यादा ख़तरनाक।

बातचीत में रंजीत सिंह, पीयुष बवेले, मनोज गोहिल और नीरज कुमार शरीक हुए। कार्यक्रम के आखिर में आलोक श्रीवास्तव और अवधेश सिंह ने अपनी कविताओं का पाठ किया। अवधेश सिंह ने अपना कविता संग्रह- ठहरी बस्ती ठिठके लोग- आलोक श्रीवास्तव को भेंट किया। बदलाव ने पत्रकारों और सृजनशील लोगों के साथ संवाद का ये सिलसिला मार्च महीने से शुरू किया है। मार्च महीने में उर्मिलेश और अप्रैल माह में कुमार नरेंद्र सिंह के साथ ‘मुसाफिर हूं यारों’ की दो कड़ियां हो चुकी हैं। तीसरी कड़ी कुछ अंतराल के बाद 16 सितंबर को गाजियाबाद के वसुंधरा में कोणार्क इंक्लेव में संपन्न हुई।


india tv 2पशुपति शर्मा ।बिहार के पूर्णिया जिले के निवासी। नवोदय विद्यालय से स्कूली शिक्षा। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से संचार की पढ़ाई। जेएनयू दिल्ली से हिंदी में एमए और एमफिल। डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय। उनसे 8826972867 पर संपर्क किया जा सकता है।

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2 thoughts on “अखबार के जरिए यथार्थ से जुड़ना, एक मुगालता- आलोक श्रीवास्तव

  1. बलाव की इस बेहतर पहल के लिए पूरी टीम को बधाई और बधाई आलोक श्रीवास्तव जी को जिन्होने पत्रकारिता के लगातार आमजनता से विमुख होते जाने के कारणों का खुलासा किया है। यहां मै मीडीया के सम्बंध मे वरिष्ठ पत्रकार पी साईं नाथ के कथन को उद्धृत करना चाहता हूं। ‘ पत्रकारिता जबतक कलम थी ,हमारे हाथ में धी। मीडिया बनी तो उसके हाथ मे चली गई जो कलम चलाना नहीं,शेयरबाजार चलाना जानता है।’
    मेरी समझ में पत्रकारिता का यह संकट उस पूंजीवाद का संकट है जिसने समता ,स्वतंत्रता और बंधुत्व के उद्घोष के साथ सामंती व्यवस्था को उखाड फेंका था। अब पूंजीवाद खुद संकट ग्रसँत है ,जिसका दुषपरिणाम केवल पत्रकारिता नहीं ,जीवन के तमाम क्षेत्रों मे देखा जा रहा है।

  2. पठनीय आलेख है , बदलाव की सभी टीम को बधाई वर्तमान में पत्रकारिता जगत दशा व दिशा पर सार्थक चर्चा हुई ।
    मेरे विचार से पत्रकारिता का संसार अन्य संसार से अलग कैसे हो सकता है यह तो इंसानी प्रकृति है कि जब भी उसमें स्वार्थ , लालच , अहंकार और कुटिलता का समावेश हुआ है तभी वो अपने उद्देश्यों से भटक गया है । मीडिया इसी भटकाव से ग्रसित है इस भटकाव में भी बदलाव की बयार बहे इस कोशिश को कामयाब करने में वरिष्ठ कवि लेखक आलोक श्रीवास्तव की बातों में जो गंभीरता है उसे हल्के में लेने का मतलब है कि आगे आने वाले युग के लिए आप अपराधी हो रहे हैं । संयोजन के लिए सभी को बधाई।

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