दलितों का रोजमर्रा का संघर्ष -“लाइफ ऑफ एन आउटकास्ट ”

दलितों का रोजमर्रा का संघर्ष -“लाइफ ऑफ एन आउटकास्ट ”

चित्रा अग्रवाल

फिल्म लाइफ ऑफ एन आउटकास्ट का दृश्य

मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई करने वाले अच्छे से जानते हैं कि सिनेमा बस मनोरंजन नहीं बल्कि अपनी बात को जनमानस तक पहुंचाने का बेहद सशक्त माध्यम है। अगर इसका प्रयोग सही तरीके से किया जाए तो यह ऑडियो विज़ुअल माध्यम, अनकहे किस्सों को कह सकता है और अनछुए पहलुओं को छू सकता है। लेखक निर्देशक पवन कुमार श्रीवास्तव की जल्द ही रिलीज़ होने वाली फ़िल्म “लाइफ ऑफ एन आउटकास्ट ” के ज़रिए भी यही कोशिश की गई है। और क्या खूब कोशिश है जो एक निष्कासित दलित परिवार के दमन, संघर्ष और जिजीविषा को बेहद तरतीबी से, शॉट बाई शॉट, सामने लाती है।

कहानी एक सवर्ण-बहुल गांव के बाहर रह रहे अधेड़ उम्र के दलित की है, जो अपनी पत्नि को ठाकुर को सौंप देने की बजाय गांव से निष्कासन चुनता है। संघर्षों से हार नहीं मानता और अपने बेटे को पढ़ाकर उसी गांव के स्कूल में गणित का अध्यापक बनाता है। लेकिन एक दिन उसके बेटे को पुलिस पकड़कर ले जाती है क्योंकि वो ब्लैक बोर्ड पर ‘ओम्’ नहीं लिखता। दलित द्वारा अपने बेटे को जेल से छुड़ाने के लिए पैसे जुटाने की कोशिशों के सफ़र पर ले जाती है यह फिल्म। इसी सफ़र के दौरान दर्शक उन सारी मुश्किलों, सारे संघर्षों से रूबरू होते हैं जो इस परिवार ने झेले हैं।

दिल्ली में स्पेशल स्क्रीनिंग के दौरान, फिल्म लाइफ ऑफ एन आउटकास्ट की टीम

कुछ दृश्य आपके दिल को छूते हैं, जैसे एक होनहार छात्र होते हुए भी केवल दलित होने के कारण, स्कूल के मास्टर द्वारा बच्चे को झाड़ू लगाने का आदेश देना। पुलिस इन्स्पेक्टर द्वारा मास्टर को जात के नाम पर बेइज़्जत करना। और सब- इन्स्पेक्टर का मास्टर को जाति-आधारित सामाजिक अनुक्रम समझाना। यह सभी दृश्य दलितों के शोषण की उस कहानी को, उस वर्ण व्यवस्था को सामने लाते हैं, जो घुटन भरी है। जो उन्हें सीधे एक बार में नहीं मारती, बल्कि तिल-तिल कर मारती है, जो उनके आत्मविश्वास को कभी ऊंचा नहीं उठने देती और दलित को दलित बनाए रखती है।

‘तुम्हारी जात से बड़ी ठाकुर की इच्छा है’, ‘जाति का सवाल गणित के सवालों से ज़्यादा कठिन है’, ‘बाबा अम्बेडकर यहां नहीं चलते ’ जैसे कुछ डायलॉग अलग-अलग संदर्भों में आते हैं, और लंबे वक्त तक जेहन में कौंधते रहते हैं। मुख्य किरदार को निभाने वाले रवि भूषण भारती अपने किरदार के साथ न्याय करते दिखते हैं। एक निष्कासित और अपने परिवार को चलाने के लिए निरन्तर संघर्षरत दलित की भूमिका में वो चेहरे पर शोषित लेकिन बेटे को छुड़ाने के लिए दृढ़संकल्पित भाव लाने में सफल रहे हैं। उनके अलावा केवल दो ही कलाकार और प्रभावित करते हैं, एक सबइन्स्पेक्टर यादव और दूसरे चाय की दुकान के मालिक। दोनों कलाकारों ने इस भारी-भरकम भावनाओं से भरी फ़िल्म में कुछ हल्के-फुल्के पल जोड़े हैं। फिल्म में केवल एक गाना है जो बेहद खूबसूरत है।

फिल्म के तकनीकी पक्ष की बात करें तो सिनेमॉटोग्राफी काफी अच्छी है। लेकिन लगता है फिल्म के सम्पादन में बहुत मेहनत नहीं की गई है। फ़िल्म के कुछ दृश्य ज़रूरत से ज़्यादा लम्बे और उबाऊ हैं, जैसे कि दलित द्वारा साइकिल चलाकर शहर में काम ढूंढने जाना और फिर वापस आना। इन दृश्यों का बार-बार दोहराव फिल्म की गति धीमी करने के साथ ही उसकी लम्बाई भी बेवजह बढ़ाता है। फ़िल्म में डायलॉग्स का प्रयोग कम से कम किया गया है। बैकग्राउन्ड स्कोर में बहुत जगह, बार-बार रामायण की चौपाईयों का प्रतीकात्मक प्रयोग किया गया है जो थोड़ा कम किया जा सकता था।

82 मिनट की इस फिल्म का सबसे मज़बूत पक्ष है इसकी कहानी। निर्देशक ने दलितों पर हो रहे हिंसात्मक अत्याचारों की बजाय उनके साथ हर दिन घटते सामाजिक भेदभाव पर फोकस किया है जो धीमे ज़हर की तरह असर करता है। इस फिल्म को हम एक अनुभव भी कह सकते हैं, दलित परिवार की ज़िन्दग़ी, उनकी गुजर-बसर का अनुभव।
निर्देशक पवन कुमार श्रीवास्तव की यह दूसरी फ़िल्म है। इससे पहले वो ‘नया पता’ बना चुके हैं जो ग्रामीण पलायन की कहानी है। दोनों ही फिल्में उन्होंने क्राउड फन्डिंग के ज़रिए बनाई हैं। निर्देशक की इस फ़िल्म को दस भाषाओं में सबटाइटिल करने और देश के 500 गांवों में दिखाने की योजना है।


चित्रा अग्रवाल। आगरा की निवासी चित्रा इन दिनों नई दिल्ली में रहती हैं। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की शिक्षा। प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया का करीब एक दशक का अनुभव।

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