LIFE OF AN OUTCAST-गरीब का कोनो जात नहीं

LIFE OF AN OUTCAST-गरीब का कोनो जात नहीं

किसलय झा

दिल्ली में स्क्रीनिंग के दौरान रवि

29 मई 2018 की शाम। फिल्म्स डिविजन ऑडिटोरियम, महादेव रोड, नई दिल्ली में फिल्म “Life of An Outcast” का प्रीमियर था। फिल्म में रवि भूषण भारतीय उर्फ रवि शाह की मुख्य भूमिका है। रवि जवाहर नवोदय विद्यालय, पूर्णियाँ के पूर्व छात्र हैं और मैं उनका सीनियर था। स्कूल के दिनों से ही उनकी रुचि अभिनय में थी और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में वह काफी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते थे। अलग-अलग भाषाओं की कई फिल्मों तथा सीरियल आदि में रवि ने अपने अभिनय की छाप छोड़ी है।

फिल्म “Life of An Outcast” की कहानी ग्रामीण परिवेश की है, जहां गहरे जड़ जमा चुके सामाजिक भेदभाव का चित्रण है। एक तथाकथित पिछड़ी जाति/दलित/अछूत (जो भी आप कह लें ) की नव वधू के साथ गाँव का जमींदार पहले सुहागरात मनाना चाहता है और विरोध करने पर गाँव से निकाल दिया जाता है। नव दंपति को गाँव छोड़ना मंजूर है, पर समझौता नहीं; और यहीं से उनका संघर्ष शुरू होता है। इनका बेटा जो काफी संघर्षों के बाद पढ़ाई कर गाँव में ही शिक्षण कार्य करता है, को गणित पढ़ाते समय ब्लैक बोर्ड पर ॐ नहीं लिखने के कारण पुलिस द्वारा गिरफ्तार करा दिया जाता है। लेकिन वह हार नहीं मानता, कहता है – “मैं गणित पढ़ाता हूँ, धर्मशास्त्र नहीं”!

इतने संघर्ष और जद्दोजहद के उपरांत भी कैसे समाज, फिर चाहे वो गाँव हो या शहर, जाति का दानव किसी का पीछा नहीं छोड़ता। ये इस फिल्म में काफी सफलतापूर्वक दिखाया गया है। जिसका आत्म-सम्मान इसे गवारा नहीं करता, वो लड़ता है; पर जिसने इस व्यवस्था से समझौता कर लिया है, वो अपनी जिंदगी में खुश है। जैसे वो पुलिस का सिपाही जो कहता है – “तुमने जात को छोड़ा है, जात ने तुम्हें नहीं छोड़ा “। और फिल्म देखते-देखते एक क्षण ऐसा आता है जब स्कूल के भेदभाव से परेशान बच्चा अपने बाप से पूछता है – ” हमलोग कौन जात हैं बाबूजी?” किसी नुकीले बरछे की तरह चुभता हुआ नायक का जवाब आता है – “गरीब का कोनो जात नहीं होत है बेटा !” यह वो जवाब है जो आज पूरे समाज के लिए प्रश्न है!

फिल्म संघर्ष पर ही खत्म हो जाती है, मानो एक सवाल सबके लिए छोड़ रही हो। आप जवाब तलाशिये, भेदभाव अपने आप खत्म हो जाएगा। पवन श्रीवास्तव ने ग्रामीण परिवेश को प्रकृतिक रूप में दिखाकर फिल्म में मौलिकता का विश्वास कराया है। नायक की साइकिल ढलान वाली पगडंडी पर दौड़ती है तो बरबस ही आप खुद को बैलेन्स करने लगते हैं ताकि वो गिर न जाए। सर्दी की सुबह की गुनगुनी ठंड सहज ही महसूस होती है और आप अनायास अपने आप को फिल्म से जुड़ा हुआ पाते हैं। संवाद कम रखे गए हैं और भाव भंगिमा का ज्यादा प्रयोग हुआ है, फिर भी कुछ कृत्रिम नहीं लगता।


किसलय झा। नवोदय विद्यालय पूर्णिया के पूर्व छात्र। पूर्णिया पॉलिटेक्निक से तकनीकी शिक्षा। बिहार के रघुनाथपुर के मूल निवासी। इन दिनों दिल्ली में निवास।

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