क्षमा के लिए ‘विषधर भुजंग’ नहीं ‘विषमुक्त संकल्प’ चाहिए

क्षमा के लिए ‘विषधर भुजंग’ नहीं ‘विषमुक्त संकल्प’ चाहिए

फोटो-अजय कुमार कोसी बिहार

दयाशंकर मिश्र

मन में क्षमा कभी गहरे नहीं उतरती, क्योंकि हम छोटे-बड़े में उलझे हैं। मन कमजोर, शक्तिशाली के चयन में उलझा है। वह चुनता है, किससे बैर/किसको क्षमा। जहां चुनाव है, वहां क्षमा बहुत देर नहीं टिकती।

जीवन संवाद 957

स्कूल में शिक्षक बच्चों से क्षमा/माफी पर संवाद कर रहे हैं। शिक्षक कहते हैं, अगर कोई तुम्हें मारे, तो तुम उसे क्षमा कर सकोगे! छोटे बच्चे को उन्होंने खड़ा करके पूछा, तुम्हारा क्या ख्याल है। बच्चे के जवाब में हमारे मन की गहरी झलक है। बच्चे ने कहा, ‘अगर वह मुझसे बड़ा हो, तो मैं कर सकूंगा। अगर वह मुझसे छोटा होगा, तो मुश्किल होगी। छोटे को माफ करना मुश्किल है।’ यह संवाद हमारी मनोदशा का आईना है। बुद्ध ने कहा है, ‘हम जिसको दबा सकते हैं, दबा देते हैं। जिसको सता सकते हैं, सता देते हैं। जिसे हम चोट नहीं पहुंचा सकते, उसके लिए बड़ी-बड़ी बातें रच देते हैं। इसलिए, मन में क्षमा कभी गहरे नहीं उतरती, क्योंकि हम छोटे-बड़े में उलझे हैं’। मन कमजोर, शक्तिशाली के चयन में उलझा है। वह चुनता है, किससे बैर/किसको क्षम।

जहां चुनाव है, वहां क्षमा बहुत देर नहीं टिकती। भीतर, जब क्षमा ठीक से बैठ जाएगी, तो बच्चा भी अगर धक्का दे दे, चांटा मार दे, तो मन जवाब को उत्सुक न रहेगा। यह अंतर जिस दिन मिट जाएगा, मन का बहुत सारा मैल अपने आप साफ हो जाएगा। अपनी दिनभर की जिंदगी में हम इतने अधिक प्रतिक्रियावादी हो जाते हैं कि हमारी ऊर्जा छोटे-छोटे अहंकारों को पूरा करने में खत्म होती रहती है। अपने शब्दों पर ध्यान दीजिए। हमारे शब्द ऐसे ही तो हैं, ‘उसने फेसबुक पर लिखा और मैंने तुरंत कमेंट बॉक्स में जाकर उसे ‘सही’ कर दिया। ऐसा उत्तर उसने कभी सोचा भी न होगा, जैसे को तैसा जवाब देने में कोई बुराई नहीं। ऐसे लोग कभी भी प्रेम से नहीं समझते। आगे से वह मुझसे टकराने से पहले कई बार सोचेगा। उसे पता होना चाहिए उसने किस से पंगा लिया है!’

यह कौन-सी भाषा है, जो हमारे भीतर उतर आई है। इसमें तो प्रेम का अंश नहीं दिखता। केवल बदला और भीतर बैठी हिंसा की झलक है। बचपन में देखा था, स्कूल के दिनों में जूडो के जगह-जगह शिविर लगते थे। यह कला बाहर से तो मारधाड़ की ही समझ में आती है, लेकिन असल में बड़ी कमाल की है। मेरे भाई ने यह कला सीखी थी। आगे चलकर वह चित्रकार हुआ, उसके स्वभाव में गहरी शांति उतरी। उसमें जूडो का बड़ा योगदान रहा। वह बचपन में शारीरिक रूप से बहुत कमजोर था, लेकिन जूडो ने उसे शारीरिक शक्ति के साथ गहरा आत्मबल भी दिया। मैं उससे जूडो तो न सीख पाया, लेकिन उसका जो मर्म समझा, वह बड़ा उपयोगी रहा। जूडो सिखाता है, कैसे विरोधी के प्रतिरोध और गुस्से को पीना है। असल में जूडो कहता है, ‘मारो मत जब कोई मारे, तो उसके सहयोगी हो जाओ, क्योंकि मारने वाला थोड़ी ही देर में थक जाएगा। उसकी शक्ति क्षीण हो जाएगी। वह अपनी शक्ति को बाहर फेंक रहा है।’ कहते हैं, ठीक से जूडो जानने वाला आदमी किसी भी तरह के विरोधी को पांच मिनट के भीतर परास्त कर सकता है। हम यह भी कह सकते हैं कि हराना नहीं पड़ता, वह स्वयं हार जाता है।

हम सब भी ठीक इसी तरह खुद से ही हारते हैं। अपनी उर्जा को दूसरों के व्यर्थ प्रहारों में नष्ट करते रहते हैं। दूसरों की ओर से फेंकी जा रही हिंसा और कचरे को पहचानते हुए उसका उपयोग करें। क्षमा कोई साधारण बात नहीं, अगर यह जीवन में उतर आए, तो हमें इतना शक्तिशाली बना सकती है कि हम पर किसी चीज का कोई असर संभव न होगा.ई-मेल dayashankarmishra2015@gmail.com

दयाशंकर। वरिष्ठ पत्रकार। एनडीटीवी ऑनलाइन और जी ऑनलाइन में वरिष्ठ पदों पर संपादकीय भूमिका का निर्वहन। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र। अवसाद के विरुद्ध डियर जिंदगी के नाम से एक अभियान छेड़ रखा है।

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