आपना मन पहिचान के… चलो जोगीरा बदलन गांव

आपना मन पहिचान के… चलो जोगीरा बदलन गांव

दयाशंकर मिश्र

छोटे-छोटे प्रश्नों पर हम इतने अधिक चिंतित होते जा रहे हैं कि जीवन में चिंता की कड़वाहट दोगुनी मात्रा में घोलते जाते हैं। अपने स्वभाव के विपरीत जाकर कहीं पहुंचना संभव नहीं। अत्यधिक सोच-विचार से बचना जरूरी है। #जीवनसंवाद स्वभाव के अनुकूल!

जीवन संवाद- 956

इस समय माता-पिता इतने अधिक चिंतित दिखते हैं कि अगर उनको उनके दादा और परदादा देख लें, तो उनको संदेह होने लगेगा कि कितने शांत और स्वस्थ मन से उन्होंने अपने बच्चों की परवरिश की थी। इस समय भविष्य को लेकर इतनी अधिक चिंता में हम सब डूबे हैं कि हर कोई इसी सोच में है कि बच्चा कैसे आइंस्टाइन, स्टीफन हॉकिंग और स्टीव जॉब्स हो जाए। बच्चों को मिलने वाले पैकेज अखबारों और सोशल मीडिया से निकलकर माता-पिता के दिमाग में इतने गहरे बस गए हैं कि उन सबने बच्चों के स्वभाव और मनुष्य के सामान्य, सहज सुख को सोख लिया है। हम जीवन जीने की कला से निरंतर दूर जाते हुए समाज बन गए हैं। छोटे-छोटे प्रश्नों पर हम इतने अधिक चिंतित होते जा रहे हैं कि जीवन में चिंता की कड़वाहट दोगुनी मात्रा में घोलते जाते हैं। हमारे बुजुर्गों के पास सुख से जीने का जो अनुभव था वह छलकते हुए अमृत के समान है, जितना मिल जाए, उतना ले ही लेना चाहिए।

एक कहानी आपसे कहता हूं। इससे मेरी बात आप तक सरलता से पहुंच सकेगी। जापानी कहानी है। एक तलवारबाज है, इतना कुशल और मशहूर कि उसका नाम सुनने के बाद अनेक अवसरों पर कोई मुकाबला करने को ही तैयार न होता। एक रात जब वह अपने घर में चैन की नींद सो रहा था, एक चूहा अचानक बिस्तर पर आकर उछलकूद करने लगा। थोड़ी देर बाद एक कोने में जाकर बैठ गया। तलवारबाज ने चूहे को भगाने की बहुत कोशिश की, लेकिन वह टस से मस न हुआ। उसके पास ही उसके प्रशिक्षण से संबंधित लकड़ी की तलवार पड़ी थी। उसने चूहे पर उससे हमला कर दिया, लेकिन जब तक उसने हमला किया, चूहा बस एक इंच सरक गया। लकड़ी की तलवार जमीन पर गिरी, उसके दो टुकड़े हो गए, पर चूहा अपनी जगह से हिला नहीं। अब तलवारबाज के आश्चर्य, गुस्से का ठिकाना न रहा। अब वह योद्धा अपनी असली तलवार लेकर आ गया। जरा सोचिए जब चूहे को मारने के लिए कोई अपनी असली तलवार लेकर आ जाए, तो उसकी पराजय निश्चित है। तलवार तो असली थी, लेकिन उसके मन में चूहे के प्रति डर बैठ गया, उसका हाथ कांप गया, उसके मन में ख्याल आया कि अगर असली तलवार टूट गई, तो सुधारने का कोई उपाय न रहेगा। मन में दुविधा घर कर जाए, तो उसे बाहर घटते देर नहीं लगती।

तलवारबाज ने जिंदगी में न जाने कितनी बार तलवार चलाई थी और वह कभी नहीं चूकता था, लेकिन आज हाथ कांपा और तलवार नीचे पड़ी, तो टुकड़े टुकड़े हो गई. एक बार फिर चूहा बस जरा-सा अपनी जगह से हटा था। अब इस योद्धा के लिए सबकुछ मुश्किल होता जा रहा था। उसने गांव में खबर करवाई कि सबसे अच्छी बिल्ली जिसके पास हो, तुरंत ले आओ। तलवारबाज डरा हुआ था, प्रतिष्ठित तलवार टूट गई थी। गांव के जमींदार के पास तेजतर्रार बिल्ली थी। जब उसे खबर मिली कि कल चूहा पकड़ने जाना है, तो वह बड़ी आनंदित हुई, बुलावे पर। मगर तभी उसके मालिक ने बताया, यह बहुत बड़ा काम है। चूहा कोई मामूली नहीं लगता। तलवारबाज़ बड़ा बुद्धिमान और कुशल है। उसकी तलवार टूट गई है। यह तुम्हारी परीक्षा है। संभलकर जाना। बिल्ली रातभर सो नहीं पाई। जब भी हम रातभर सोते नहीं, अगले दिन ठीक से कुछ कर नहीं पाते। बिल्ली की तो बड़ी परीक्षा थी। वह योजना बनाने में जुटी रही। उसके मन में बैठ गया था कि चूहा असाधारण है। बिल्ली घर पहुंची, तो देखा कि तलवार टूटी पड़ी है। चूहा वहीं पास में मस्त बैठा है। बिल्ली को देखकर वह पीछे हटने की जगह उसकी ओर आगे बढ़ा। बिल्ली घबराकर लौट आई। उसने चूहे बहुत देखे थे, लेकिन बिल्ली की ओर आगे बढ़ता न देखा था।

अब तो तलवारबाज की हिम्मत टूट गई। उसने सम्राट से मदद मांगी। सम्राट की बिल्ली देश की सबसे अच्छी बिल्ली थी। बिल्ली को जब खबर मिली, तो उसने सम्राट से कहा, मुझे ऐसे छोटे-मोटे चूहे को मारने को भेजा जा रहा है। चिंतित सम्राट ने कहा, वह साधारण चूहा नहीं। तलवारबाज की तलवार टूट गई है। कई बिल्ली हार गई हैं, सावधान रहना। अंततः सम्राट ने भी बिल्ली का स्वभाव बदल दिया। बिल्ली का स्वभाव है, फुर्ती से चूहे पर झपट्टा मारना। पलक झपकते ही उसका काम-तमाम कर देना। सम्राट बिल्ली को सहजता से दूर कर रहा था।

हम सब सर्वोत्तम तैयारी के नाम पर यही करते हैं। खुद का और बच्चों का स्वभाव बदलते रहते हैं। जिसका डर था, वही हुआ। सम्राट की बिल्ली भी हार गई। उसने जोर से झपट्टा मारा, लेकिन चूक गई। दीवार से उसका मुंह टकराया, चेहरे पर चोट के निशान लिए लौट आई। चूहा अपनी जगह था। तलवारबाज का बुरा हाल था। अंततः सम्राट की बिल्ली ने सुझाया, हमें फकीर की बिल्ली से मदद मांगनी चाहिए। वही हमारी गुरु है। फकीर ने अपनी बिल्ली सहज दे दी, बिना निर्देश के। रास्ते में बिल्लियों ने उसे सलाह देनी चाही, तो उसने कहा, सबको अपने स्वभाव के अनुसार ही व्यवहार करना चाहिए, बिल्ली को भी। फकीर की बिल्ली तलवारबाज के घर पहुंची, तो चूहा वहीं था। वह भीतर गई, चूहे को पकड़कर वापस आ गई। बिल्लियों की भीड़ लग गई। सब पूछने लगे कैसे किया!फकीर की बिल्ली का उत्तर हमारे काम का है। ‘मैं बिल्ली हूं, यह चूहा। इसको पकड़ने के लिए हमेशा से बिल्ली होना काफी था। तुम लोगों ने ज्यादा योजना बनाई, इससे ही परेशान हुए। जब हम अपने स्वभाव के विपरीत चले जाते हैं, स्वयं से दूर होते जाते हैं’। यह कहानी हर रिश्ते, उलझन को सुलझाने का दृष्टिकोण देती है। संकट अपनी जगह ही रहता है. सबकुछ हमारे नजरिए पर ही निर्भर है. अपने स्वभाव की रक्षा ही सबसे मूल्यवान है।ई-मेल dayashankarmishra2015@gmail.com

दयाशंकर। वरिष्ठ पत्रकार। एनडीटीवी ऑनलाइन और जी ऑनलाइन में वरिष्ठ पदों पर संपादकीय भूमिका का निर्वहन। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र। आप उनसे ईमेल : dayashankar.mishra@zeemedia.esselgroup.com पर संपर्क कर सकते हैं। आपने अवसाद के विरुद्ध डियर जिंदगी के नाम से एक अभियान छेड़ रखा है। संपर्क- डियर जिंदगी (दयाशंकर मिश्र), वास्मे हाउस, प्लाट नं. 4, सेक्टर 16 A, फिल्म सिटी, नोएडा (यूपी

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