जीते जी हाल पूछोगे… प्यार करोगे… तो अफसोस न रहेगा!

जीते जी हाल पूछोगे… प्यार करोगे… तो अफसोस न रहेगा!

दयाशंकर मिश्र

आभार या खेद के फूल! हम जीवन के प्रति अपने चुनाव में इतने अस्पष्ट और द्वंद्व से भरे हुए हैं कि अक्सर खुद को सोचने तक ही सीमित रखते हैं। मेरे एक मित्र को गांव बहुत प्रिय हैं। कुछ समय पहले उनके दादाजी नहीं रहे, तो वह बड़े ही व्याकुल हो गए। उनके अंतिम दर्शन भी न कर सके, लेकिन उसके बाद बाकी क्रियाकलापों के लिए वह पंद्रह दिन गांव जाकर रहे। उनके इस व्यवहार ने मुझे एनी फ्रैंक के वक्तव्य की याद दिला दी।

जीवन संवाद 953

फ्रैंक ने कहा है, ‘जीवित इंसान को इतने फूल नहीं दिए जाते, जितने मौत के बाद चढ़ाए जाते हैं, क्योंकि आभार के मुकाबले हम खेद ज्यादा मजबूती से व्यक्त करते हैं। ‘हम अपने आसपास जीवित व्यक्तियों के लिए प्रेम के मामले में कुछ इसी तरह दिखते हैं। जीवित व्यक्तियों के लिए हमारे सरोकार इतने गहरे नहीं, जितने मृत व्यक्तियों केे लिए। समाज और सरकार दोनों एक ही शैली में हैं। सरकार जीवित व्यक्तियोंं के इंतजाम की जगह दुर्घटना पर कहीं तेजी से सक्रियता दिखाती है। जैसे हम बुजुर्गों के प्रति हैं। सरकार वैसे ही पुराने पुलों, व्यवस्था और इंतजामों के लिए है। सरकार जानती है कि यह जर्जर है इसे देखरेख (प्रेम) की जरूरत है, लेकिन यह प्रेम तभी उतरता है जब कुछ घट जाता है। हम प्रेम की जगह शोक में जुटने वाली भीड़ बनते जा रहे हैं।

एक बार मेरे पास भी ऐसा अवसर आया। हम दादी को अंतिम विदाई देने के लिए जुटे थे। उनका शरीर कुछ ही देर के लिए हमारे साथ था। तभी मन में किसी ऐसे व्यक्ति का स्मरण हुआ, जिसका जीवन गहरी पीड़ा में था। समय की पाबंदी कुछ इस तरह थी कि मुझे दादी की अस्थियां गंगा में विसर्जित करने और उस व्यक्ति के पास पहुंचने में से किसी एक को ही चुनना था। मैं स्वयं तो यह निर्णय न कर पाता, संभव है दादी की प्रेरणा से अवचेतन में इस तरह का विचार पैदा हुआ हो, क्योंकि वह अपने विचारों को लेकर बहुत मुखर थीं। हमारा प्रेम तो खूब गहरा था, लेकिन हम असहमति को लेकर कभी पीछे नहीं हटते थे. मैंने दादी की अस्थियों के साथ जाने को स्थगित करते हुए उनके पास पहुंचने का निर्णय लिया, जिनको संभवत: मेरी प्रतीक्षा थी।

हम अपने जीवन में अनेक अंतिम यात्राओं का हिस्सा होते हैं, लेकिन मेरे साथ यह पहली बार घट रहा था कि किसी की चिता के पास मुझे दूसरे किसी जीवन का स्वर इतना स्पष्ट सुनाई दे रहा था। यहां यह लिखने का विशेष महत्व नहीं है कि इसके लिए मुझे खूब आलोचना सहनी पड़ी, लेकिन जिसके लिए मैंने यह किया, उसके जीवन में सुख के फूल खूब खिले। ऐसे फूल अगर खिलते रहें, तो विरोध सहने का आनंद दोगुना हो जाता है।फेसबुक, सोशल मीडिया पर हम अक्सर ही लोगों के संस्मरण पढ़ते रहते हैं कि वह अपने प्रिय के पास पहुंचने के लिए समय नहींं निकाल पा रहे। इसका अर्थ यह है कि वह जीवित के पास प्रेम के लिए उपलब्ध नहीं हो पा रहे, जबकि जैसे ही उनके नहीं रहने की खबर आती है, समय स्वयं मिल जाता है। ऐसा लगता है कि खेद के फूल कहीं सरलता से उपलब्ध हो जाते हैं।


दयाशंकर। वरिष्ठ पत्रकार। एनडीटीवी ऑनलाइन और जी ऑनलाइन में वरिष्ठ पदों पर संपादकीय भूमिका का निर्वहन। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र। आप उनसे ईमेल : dayashankar.mishra@zeemedia.esselgroup.com पर संपर्क कर सकते हैं। आपने अवसाद के विरुद्ध डियर जिंदगी के नाम से एक अभियान छेड़ रखा है। संपर्क- डियर जिंदगी (दयाशंकर मिश्र), वास्मे हाउस, प्लाट नं. 4, सेक्टर 16 A, फिल्म सिटी, नोएडा (यूपी

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