‘मन-दीपक’ जलाइए, निराशा का अंधकार मिटाइए

‘मन-दीपक’ जलाइए, निराशा का अंधकार मिटाइए

फोटो साभार- अरुण कुमार

दयाशंकर मिश्र

हम ऐसी दुनिया का हिस्सा बनते जा रहे हैं, जिसमें डर को ज़रूरत से ज्यादा महत्व दिया जा रहा है. कुछ खोने, पिछड़ जाने, नौकरी चले जाने का डर. रातों-रात बर्बाद हो जाने का डर. जब भीतर का दीया कमजोर पड़ता है, तो ऐसे डर आसानी से मन में बैठने लगते हैं. #जीवनसंवाद भीतर का दीया !

जीवन संवाद 965

हम सबको अपने महत्वपूर्ण होने का इतना विश्वास है कि दिमाग़ पर हम इसका बोझ बढ़ाते ही जाते हैं. मुझे लगता है कि हम सब उस छिपकली की तरह हैं, जिसे महलों की इतनी चिंता है कि वह उन्हें छोड़कर जाना नहीं चाहती. न जाने किस क्षण गिर जाएं. बचपन में हम कहानी सुनाते थे. छिपकली को उसके मित्रों ने भोज के लिए आमंत्रित किया. जरूर कहीं शादी – ब्याह रहा होगा. पहले तो वह राज़ी हो गई लेकिन अगले ही क्षण उसने कहा, मेरा आना संभव न होगा. इस महल को कौन संभालेगा मैं रहती हूं तो छप्पर संभला रहता है . मैं गई तो गिर जाएगा! अपने आसपास ख़ुद और दूसरों को भी अक्सर हम इसी तरह के बोझ से दबे हुए बातें हैं. जिस तरह छिपकली भूल जाती है कि छप्पर उससे नहीं टिका है, बल्कि छप्पर के कारण छिपकली टिकी है. ठीक इसी तरह हम भी अपनी -अपनी दुनिया में रमे हुए अपने महत्वपूर्ण होने के कारण को बहुत अधिक महत्व देते जाते हैं. कुछ समय पहले लखनऊ से एक युवा ने जीवन के विषय में बात करने के लिए मिलने की इच्छा जताई. मिलना तय हुआ. एक नहीं, कई बार तय हुआ. लेकिन हर बार वह स्थगित हो गया. खुशी है कि एक बार भी मेरे कारण नहीं हुआ.

वह किसी ऐसी नौकरी में नहीं है, जहां छुट्टी मिलने में दिक्कत है. बल्कि अनेक लोगों की नौकरी का आधार हैं. अपना आना-जाना वही तय करते हैं. लेकिन हर बार उन्होंने यही पाया कि अगर एक दिन के लिए भी चले आए शहर छोड़ कर तो न जाने क्या हो. इतना कम भरोसा उन पर जिनके भरोसे कारोबार चलता है! ऐसा तब है, जब हर बार कहते हैं कि इस बार तो आकर ही मानेंगे. मैं निश्चिंत रहता हूं जब भी कहते हैं, आ जाऊं! मैं कह देता हूं, आ जाइए क्योंकि जानता हूं, कभी नहीं आ पाएंगे! हम ऐसी दुनिया का हिस्सा बनते जा रहे हैं, जिसमें डर को ज़रूरत से ज्यादा महत्व दिया जा रहा है. कुछ खोने, पिछड़ जाने, नौकरी चले जाने का डर. रातों-रात बर्बाद हो जाने का डर. जब भीतर का दिया कमजोर पड़ता है, तो ऐसे डर आसानी से मन में बैठने लगते हैं. काश! हम इस बात को समझ पाएगी जीवन से महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं. ऐसे लोगों के बारे में जानिए, उनकी और देखिए, जिनके पास सब कुछ हो कर भी जीवन बहुत कम बाकी है.जो सब कुछ देने को राजी हैं, जीवन के बदले. दूसरी ओर जिनके पास बेहतर मानसिक स्वास्थ्य और शरीर है वह खुद को इतना अधिक असहाय और कमजोर मानने की गलती कर बैठते हैं कि जीवन को अनायास ही खतरे में डाल देते हैं.

पिछले दिनों एक मित्र दिल्ली से छोटा सा पत्र लिखकर कहीं चले गए. पत्नी और बच्चे परेशान हैं. समझ नहीं पा रहे कि कैसे राई का पहाड़ उनके जीवन के नाविक ने बना लिया. जिस तरह के शब्द उसमें हैं.जिस तरह वह गए, उससे विश्वास है कि वह अपने जीवन को संकट में नहीं डालेंगे. लेकिन उन्होंने वही गलती की जो छिपकली किए बैठी है. इतना बोझ! अपने तन और मन पर डाल लिया है कि भीतर का दिया घबराने लगा. यह जो हमारे भीतर का दीया,उजाला है. इसे मन से ही शक्ति मिलती है.मन को शक्तिमान होने के लिए हल्का होना जरूरी है. दुनिया में सबसे अच्छे वायुयान वही माने जाते हैं जो हल्के होते हैं. पहाड़ की चढ़ाई पर जाते हुए पीठ पर वज़न नहीं रखा जाता. ऊंचाई की ओर जाते समय शरीर और मन दोनों को ही हल्का रखना पड़ता है. इसलिए दिमाग़ को बेकार के वज़न से मुक्त करें. स्थितियां जैसी भी हों, उनका मुकाबला करें क्योंकि जिनके जीने के लिए बहुत सारी शर्तों का होना जरूरी नहीं केवल जीवन होना ही जरूरी है. ई-मेल dayashankarmishra2015@gmail.com

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