पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, गांधी भया न कोय

पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, गांधी भया न कोय

ब्रह्मानंद ठाकुर

गांव-घर में  आज-कल खेती-पथारी, माल-मवेशी, शादी-विवाह की चर्चा न के बराबर होती है। कारण है अभी न खेती-किसानी का मौसम है और न शादी-विवाह का लगन। खेत में लगी धान की फसल तइयार होने को है। कुछ निफुट हो गया  है तो कुछ की बाली घोघ  से निकलने को आतुर है। न खेत जोतिया का झंझट और न खाद-पानी की चिंता।’ आगे जो होना है सो होएबे करेगा। कुछ इसी अंदाज में घोंचू भाई की मंडली निफिक्किर हो कर आज की बतकही में मनकचोटन भाई के दरवाजे पर दिन अछइते जमा हो गई है। परसन कक्का, चुल्हन भाई बटेसर, बिल्टु , भगेरन चच्चा और फुलकेसर सब जुट गये हैं।

घोंचू उवाच-14

मनकचोटन भाई भी आज फुर्सते में दिखे, सो उहो इस मंडली में हाजिर हो गये। खाली अब घोंचू भाई का इंतजार है। घोंचू भाई इन दिनों विवेकी राय के उपन्यास सोनामाटी  के किरदार महुवारी वाले रामरूप की भूमिका में हैं, सो इन दिनों वे टूटते-बिखरते रिश्ते, आपसी वैमनस्य, धूर्तता, चालबाजी, अपनी पहचान खोते गांव  जैसी समस्याओं  के समाधान की राह खोजने में लगे हुए हैं। जहां कहीं भी उन्हें ऐसे  किसी प्रयास की भनक मिलती है या ऐसे किसी आयोजन की जानकारी मिलती है, साइकिल से चल पड़ते हैं बिना किसी बुलावे के। कुछ कहने के लिए नहीं, सुनने और समझने के लिए। ऐसा इसलिए भी कि हमारे घोंचू भाई को हमेशा से कहने में नहीं, करने में विश्वास रहा है। सो घोंचू भाई 2 अक्टूबर गांधी जयंती कार्यक्रम में भाग लेने शहर गये थे। मुझसे उन्होंने कहा था कि शहर में गांधी जयंती पर एक बड़ा आयोजन होने वाला है। 1917 में महात्मा गांधी अपनी चम्पारण यात्रा के सिलसिले में  मुजफ्फरपुर के एलएस कालेज में ठहरे थे और वहां जिस कुएं पर उन्होंने स्नान किया था, वहां उनकी स्नान करती हुई प्रतिमा का अनावरण होगा। बड़े-बड़े गांधीवादी आएंगे। शायद गांव और गांव की दुर्दशा से मुक्ति का कोई राह दिख जाए।  इसलिए उन्होंने उस कार्यक्रम में जाने का फैसला किया था।

बतकही में शामिल लोग उनका इंतजार कर रहे थे, मगर वे अब तक लौटे नहीं थे। मनकचोटन भाई उन्हीं  की चर्चा शुरू ही किए थे कि घोंचू भाई अपनी साइकिल की घंटी बजाते नमूदार हो गये। घोंचू भाई  परसन कक्का, मनकचोटन भाई और भगेरन चच्चा के बगल में बैठ गए और ललका गमछा से चेहरे का पसीना पोंछते हुए कहन लागे ‘ सब बेकार है। हर आदमी दोहरा चरित्र वाला। जो उसके अंदर है वह बाहर नहीं दिखाई देता और जो बाहर दिखता है,वह उसके अंदर में है ही नहीं। अब तो लोग खुल्लमखुल्ला हमारे महापुरुषों को भी अपने व्यक्तिगत हित में भुनाने लगे हैं। किसी को हमारे देश के किसानों, मजदूरों, छात्र नौजवानों और महिलाओं की चिंता नहीं है। सब अपनी ही धुन में मस्त हैं। अब तो जनता को ही अपने हित की लड़ाई लड़नी होगी।’  इतना कहते हुए घोंचू भाई का चेहरा तमतमा गया। मनकचोटन भाई ने उसे लक्ष्य करते हुए मनसुखबा से कहा ‘एक ग्लास पानी पिलाओ घोंचू भाई को।’

घोंचू भाई पानी पीने के बाद जब सामान्य हुए तो कहने लगे  ‘देखिए, शहर में गांधी जयंती का भव्य आयोजन था लेकिन गांधी के विचारों से जुड़े किसी व्यक्ति को वहां आमंत्रित नहीं किया गया था। ज्यादातर उस कार्यक्रम में मैंने आटोमोबाइल, परिवहन और रियलस्टेट के व्यवसाय वाले महान हस्तियों को पहली पांत में बैठा देखा। हद तो तब हो गई जब उस कार्यक्रम में सरकारी निमंत्रण पर आए 98 वर्षीय एक  सीधे- सादे स्वतंत्रता सेनानी को एक कोने में दुबक कर बैठा देखा और भाषण ?

मत पूछिए, एक मंत्री ने तो यहां तक कह दिया कि महात्मा गांधी डेढ़ सौ साल पहले यहां आए थे। अब उन्हें कौन बताए कि डेढ़ सौ साल पहले तो उनका जन्म हुआ था। साधारण आदमी भी जानता है कि वे  101 साल पहले  अप्रैल 1917  में पंडित राजकुमार शुक्ल के निमंत्रण पर चम्पारण जाने के सिलसिले में मुजफ्फरपुर आए थे।  इस आयोजन में जितने लोग थे, उनमें गांधी के जीवनमूल्यों का लेशमात्र दिखाई नहीं दिया लेकिन गांधी के नाम की माला सभी जप रहे थे। पर उपदेश कुशल बहुतेरे। ‘

इतना कहकर कुछ देर के लिए घोंचू भाई चुप हो गये। उनके माथे पर पसीना चुहचुहा रहा था।  इस बीच मनसुखबा चाय लेकर हाजिर हुआ। मैंने उस बतकही में शामिल सभी लोगों के हाथ में चाय का कप पकड़ाया। सभी लोग चाय पीने लगे। इस बीच मैंने गाय को नाद पर खूंटे से बांधा और नाद में चारा डाल उसमें दो बाल्टी पानी रख दिया। गाय चारा खाने लगी और मैं फिर बतकही में शामिल हो गया। बेर डूब गया था। बिजली गायब थी। मनसुखबा लालटेन जलाकर ओसारा पर टांग दिया और खुद खटिया पर बैठ गया। आज पहली बेर वह बतकही के उत्तरार्ध में शामिल हो रहा था। घोंचू भाई फिर नये सिरे से शुरू हो गये। कहने लगे,  ‘ देखिए, गांधी के नाम पर कैसा-कैसा ड्रामा शुरू हो गया है ? आजादी के बाद 50 वर्षों से अधिक समय तक जो कांग्रेस देश की सत्ता पर काबिज रही, उसी के नेता कह रहे हैं कि अब आजादी की दूसरी लडाई छेड़ने की जरूरत है। आप लोगों ने अखबारों मे पढ़ा ही है और टीवी पर देखा भी है कि पिछले दिन  वर्धा के सेवाग्राम में जब कांग्रेस वर्किंग कमिटी की बैठक हुई तो इसके नेता सोनायाजी और राहुल गांधी ने सेवाग्राम आश्रम में भोजन करने के बाद अपना बर्तन खुद धोने का काम किया।

मानता हूं कि ऐसा करना वहां का नियम है, लेकिन आखिर यह नियम बना कैसे ?  गांधी जी  अपना सारा काम  खुद करते थे, इसलिए ऐसा सबसे करने की बात कहते थे। तभी तो यह नियम बना होगा ?  मगर सोनिया जी, राहुल जी या अन्य कांग्रेसी नेता क्या अपने दैनिक जीवन में ऐसा करते हैं ?  नही न ?   और वर्धा में यह सम्मेलन 76  सालों बाद हुआ।  पहला सम्मेलन आजादी से 5 साल पूर्व हुआ था,1942 में। इसी सम्मेलन मे महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत की थी। इस बीच कांग्रेसियों को वर्धा की याद क्यों नहीं आई? गांधी के नाम पर बहुत ड्रामा होने लगा है भाई ! यह तथ्य इतिहास में दर्ज है। इसे झुठलाया नहीं जा सकता ।

 आज से कोई 100 साल पहले महात्मा गांधी ने नव वर्ष 1918  के दिन अहमदाबाद में जनसभा को संबोधित करते हुए  गुजराती में  कहा था- हवा, पानी, अणे, अनाज-ए खोराक ना मुख्य तत्वो छे (हवा, पानी और अन्न मनुष्य के पोषण के तीन जरूरी तत्व हैं)। और यदि स्वराज का मतलब खुद का राज्य है तो, इन तीन खुराकों का मतलब है स्वराज हासिल करना। हवा और पानी सबके लिए जरूरी और मुफ्त है मगर वही प्रदूषित हो जाए तो ? लेकिन आज अपने देश में इनकी क्या स्थिति है ?  वायु प्रदूषण के मामले  में अमरीका, चीन और यूरोपियन समुदाय के देशों  के बाद हमारे देश का ही नाम आता है। पानी और अनाज का संकट दिन प्रति दिन गहराता जा रहा है। खेती-किसानी अब अलाभकर हो गई है। कर्ज के जाल मे फंस कर किसान आत्महत्या करने लगे हैं। महात्मा गांधी का जीवन मूल्य  और उनका व्रत,  सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, शरीर श्रम, अस्वाद, सर्व भय वर्जन और सर्व धर्म समभाव अब  कहीं हमारे आचरण में नहीं पुस्तकों में ही ढूंढा जा सकता है।’  इतना कह कर घोंचू भाई चुप हो गये। अंधेरा छा गया था। मनसुखबा दुबारे चाय ले आया। मनकचोटन भाई ने यह कहते हुए आज की बतकही समाप्त करने का इशारा किया कि गांधी के जीवन मूल्यों को दरकिनार कर गांधी का नाम जपने से कुछ भी नहीं होने को है।


ब्रह्मानंद ठाकुर। बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। मुजफ्फरपुर के पियर गांव में बदलाव पाठशाला का संचालन कर रहे हैं।

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