सहिष्णुता और गांधी

सहिष्णुता और गांधी

पशुपति शर्मा

दक्षिण अफ्रीका में जोहांसबर्ग से प्रिटोरिया तक की रेल यात्रा। पीटरमारित्जबर्ग में ट्रेन से धक्का देकर गांधी को उतार दिया गया। गांधी ने यहीं तय किया कि वो ऐसा अपमान नहीं सहन करेंगे, वो रात भर प्रतीक्षाकक्ष में आत्ममंथन करते रहे। ये गांधी के ‘गांधी’ बनने के शुरुआती दिन थे। गांधी के आख़िरी दिनों में सबसे ज्यादा अहम हैं नोआखाली में बिताए गए दिन। तब गांधी ‘गांधी’ बन चुके थे लेकिन संघर्ष का सिलसिला जारी था। गांधी जैसे शख्स की इस यात्रा में हैं, सहिष्णुता के वो तार जो उनकी शख्सियत को एक नई धार देते हैं। सहिष्णुता का ही वो मंत्र है, जिसके बूते कठिन से कठिन पलों में भी गांधी अपनी ‘बेचैनी’ और ‘बेबसी’ को नया अर्थ दे जाते हैं। वो मुश्किल हालात में हताश और निराश होने की बजाय, बौखलाहट में प्रतिकार करने की बजाय, हालात पर मंथन करने का सब्र दिखाते हैं और उससे लड़ने की ताकत इकट्ठा करते हैं। विदेशी धरती पर हुए अपमान से लेकर देशी धरती पर हिंसा के प्रचंड दौर के बीच दिखता है एक ‘सहिष्णु गांधी’।

सहिष्णुता यानी सहन करने की ताकत। कहने की जरूरत नहीं कि सहिष्णुता एक सतत साधना है। सहिष्णुता एक निरंतर संघर्ष है। अपने अंतरमन और बाह्य परिस्थितियों के साथ द्वंद्व के बीच सहिष्णु बनने के लिए सचेत मन से एक साधना करनी होती है। सत्य और अहिंसा के दो मूल सिद्धांतों के ईर्द-गिर्द खुद की शख्सियत को खड़ा करने वाले मोहनदास करमचंद गांधी की ज़िंदगी में भी ये द्वंद्व जरूर रहा होगा लेकिन उन्होंने अपनी आत्मशक्ति से खुद को सहिष्णुता के पाले में रखने की भरसक कोशिश की। ये और बात है कि युवाओं के बीच जान-बूझकर एक जुमला बार-बार दोहराया गया “मजबूरी का नाम महात्मा गांधी “। जबकि सच इससे कहीं इतर है- ‘मजबूती का नाम महात्मा गांधी’। अपनी सहिष्णुता के बल पर मजबूरी को मजबूती बना देने की शख्सियत का नाम है गांधी।

दो-चार होना पड़ता है। सहिष्णुता को आम तौर पर लोगों की कमजोरी मान लिया जाता है। गांधी की डिक्शनरी में सहिष्णुता का मतलब कभी कमजोरी नहीं रहा, लेकिन एक अहिंसक सेना के निर्माण का अस्त्र रहा सहिष्णुता। उन्होंने संघर्ष के बीच सहिष्णुता के बीज जितनी मुश्किल से हिंदुस्तानी मानस में बोए, वो दुनिया में बिरले ही नज़र आता है। आज़ादी के संघर्ष के दिनों में जब क्रांतिकारी तत्काल अंग्रेजों को खदेड़ देने की वकालत कर रहे थे, हिंसक प्रतिरोध कर रहे थे, गांधी समाज में अहिंसा का पाठ पढ़ा रहे थे, सहिष्णुता की वकालत कर रहे थे।

13 अप्रैल 1919 को जालियांवाला बाग जैसा कांड हुआ। अंग्रेजी प्रशासकों की इतनी बड़ी हिंसक कार्रवाई के बीच उद्वेलित गांधी को पंजाब जाने की इजाजत नहीं मिली। नवंबर में दिल्ली में मुस्लिम कॉन्फ्रेंस के मंच पर आत्ममंथन के दौरान ही गांधी ने ‘असहयोग’ का प्रस्ताव रखा। 1919 के अंतिम सप्ताह में जालियांवाला बाग के करीब अमृतसर में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। ये गांधी के वैचारिक प्रतिरोध की कला और सहिष्णुता के उनके तप की अग्निपरीक्षा का दौर था। 1920 में कांग्रेस ने असहयोग आंदोलन का ऐलान किया लेकिन चौरी-चौरा की घटना हुई तो गांधी परेशान हो गए। अपने लोगों की हिंसा देखकर, असहिष्णुता देखकर विचलित हो गए और आंदोलन वापस लेने का एक बड़ा फैसला कर लिया। गांधी को इस फैसले के लिए अपने समकालीनों की आलोचना झेलनी पड़ी लेकिन वो अपने फैसले से डिगे नहीं।

मुन्ना भाई ‘एमबीबीएस’ का वो संवाद कई युवाओं की जुबान पर सुनाई देता है- “बापू ने पहले गाल पर थप्पड़ पड़ने पर दूसरा गाल बढ़ाने की नसीहत दी, लेकिन दूसरे गाल पर थप्पड़ पड़ने पर क्या करें ये नहीं बताया।” और फिर मुन्ना भाई का असली चरित्र सामने आ जाता है और वो अपने विरोधी की धुनाई कर देता है। ऐसे मुन्ना भाई हमारे और आपके बीच भी मौजूद हैं, जो गांधी के आदर्शों की आधी-अधूरी समझ के साथ गांधीवाद का दम भर रहे हैं। गांधी की सहिष्णुता की साधना का धैर्य युवा पीढ़ी को दिखाना होगा। अपने समाज और राष्ट्र को बदलना है तो अहिंसक प्रतिरोध की ताकत हासिल करनी होगी।  गांधी ने कहा- “यदि आप किसी को सुधारना चाहते हैं या अपनी आत्मा को बलवान बनाना चाहते हैं तो क्षमा करना सीखिए।” और क्षमा करने की ये प्रवृति ही आपको सहिष्णु बनाने की बुनियादी शर्त है।

मुखबिर की तरह काम कर रहा था। उसने गांधी का खुलकर विरोध भी किया लेकिन जब इस ‘मुखबिर’ के बुरे दिन आए तो गांधी सब कुछ भूलाकर उसकी मदद को पहुंच गए। ये दैनिक जीवन में गांधी की सहिष्णुता की एक मिसाल है। आप वैचारिक विरोध को कैसे दर्ज कराते हैं और कैसे उसे व्यक्तिगत होने से रोकते हैं, ये भी एक सहिष्णु इंसान की समझ के लिए जरूरी है। गांधी कभी हिंसा का जवाब हिंसा से देने के पक्षधर नहीं रहे। उन्होंने व्यक्तिगत हमलों का भी जवाब संयम के साथ दिया। ऐसे मामलों में सहिष्णुता का एक और आयाम नजर आया।

सहिष्णु गांधी ने गौरवशाली और शांतिपूर्ण प्रतिरोध के तरीके ईजाद किए। अहमदाबाद में मिल मालिकों के खिलाफ मजदूरों की हड़ताल के दौरान उन्होंने पहली बार उपवास के अस्त्र का इस्तेमाल किया। गांधी के तीन दिन के उपवास से ही मिल मालिकों में खलबली मच गई और 21 दिन की हड़ताल टूट गई। दैनंदिन जीवन में प्रतिरोध के लिए जिस आत्मबल की जरूरत होती है, वो गांधी ने हासिल किया था अपने तप से। लुई फिशर ने ‘गांधी की कहानी’ में लिखा है- “गांधी पूंजीवादी शोषण के विरोधी होते हुए भी पूंजीपतियों के प्रति सहिष्णु थे।” युवाओं के बीच पूंजीपतियों के मददगार के तौर पर गांधी को पेश करने की कोशिश करने वालों को ऐसे तथ्य से टकराना जरूर चाहिए।

सहिष्णुता और अहिंसा के गांधी के पाठ को समझने के लिए एक और घटना का जिक्र जरूरी जान पड़ता है। अहमदाबाद के मिल मालिक अंबालाल साराभाई ने अपनी मिल के अहाते में चक्कर लगाने वाले 60 आवारा कुत्तों को पकड़कर मरवा दिया था, इस पर काफी विवाद हुआ। लेकिन गांधी ने इसका बचाव किया- “हम जैसे अपूर्ण और भूलें करने वाले मनुजों के सामने कुत्तों को मारने के अलावा कोई दूसरा कोई मार्ग ही नहीं है। कभी-कभी हमारे सामने उस आदमी को मारने का अनिवार्य कर्तव्य हो जाता है, जो लोगों को मारता हुआ पाया जाय।” यंग इंडिया में आगे उन्होंने लिखा- ” प्राणहरण भी कर्तव्य हो सकता है। मान लीजिए कि कोई आदमी बदहवास होकर तलवार हाथ में लिए बेतहाशा दौड़ता फिर रहा है, जो सामने आता है , उसे मार डालता है और उसको जिंदा पकड़ने की किसी की हिम्मत नहीं होती। इस दीवाने को यमपुरी पहुंचाने वाला समाज की कृतज्ञता का पात्र होगा।” गांधी का ये चेहरा कम ही दिखाई पड़ता है और इसकी चर्चा भी कम होती है। यहां गांधी का अपने ही विचारों से संघर्ष और अंतर्द्वंद्व भी सामने आता है।

गांधी ने असहिष्णुता के प्रयोग के दौरान इस बात की वकालत जरूर की है कि इंसान का वजूद बना रहना चाहिए। अकारण ही हम इस वजूद को दांव पर न लगा दें। इसके विपरीत नोआखाली में जब उद्देश्य बड़ा हो जाता है तो गांधी अपने समर्थकों से जान की कुर्बानी देने का संकल्प भी लेते हैं। वो कहते हैं कि हमें नोआखाली के हर गांव में ऐसा कार्यकर्ता चाहिए जो हिंदू-मुस्लिम वैमनस्यता को खत्म करने के लिए अपनी जान की बाजी लगाने को तैयार हो। उन्होंने बार बार कहा-“बहुसंख्यक हिंदू अल्पसंख्यक मुस्लिमों के साथ अच्छा बर्ताव करें और दोनों अहिंसा का पालन करें।” 7 नवंबर 1946 से 2 मार्च 1947 तक गांधी नोआखाली के गांवों में ही घूमते रहे। यह उनकी प्रायश्चित की यात्रा थी। एक सहिष्णु भारत के निर्माण में ऐसी प्रायश्चित यात्रा आज के वक्त की भी दरकार है, क्या हमारा युवा इतनी सहिष्णुता हासिल करने का संकल्प लेने को तैयार है?

गांधी की सहिष्णुता के द्वंद्व का गवाह कस्तूरबा भी रहीं। कई मौकों पर दुनिया के लिए सहिष्णु गांधी बा के लिए असहिष्णु  नजर आए। कई अहम मोड़ पर अंग्रेजों के लिए सहिष्णु गांधी, हिंदुस्तानियों को असहिष्णु नज़र आए। उनकी सहिष्णुता अपनों के लिए अलग और दुश्मनों के लिए अलग नजर आई। लेकिन इन सबको गांधी ने कैसे साधा, ये सिर्फ और सिर्फ गांधी का मन ही जानता है। ऑक्सफोर्ड के प्रोफेसर गिल्बर्ट मरे के कथन के जरिेए इस समझें तो-“इस आदमी से व्यवहार करने में सावधान रहो। वह एक खतरनाक और परेशान करने वाला शत्रु है, क्योंकि उसका शरीर जिसे आप कभी भी जीत सकते हैं, उसकी आत्मा को ज़रा भी पकड़ में नहीं आने देता। ” उनकी इसी न पकड़ आने वाली आत्मा में सहिष्णुता की गहरी जड़ें रही हैं, जिसके पुष्पित और पल्लवित होने का वक्त हमेशा हुआ करता है… वो वक्त कल भी था और आज भी है। साभार- मध्य प्रदेश पब्लिक रिलेशन सोसायटी की पुस्तिका । 


 

पशुपति शर्मा ।बिहार के पूर्णिया जिले के निवासी। नवोदय विद्यालय से स्कूली शिक्षा। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से संचार की पढ़ाई। जेएनयू दिल्ली से हिंदी में एमए और एमफिल। दो दशक से पत्रकारिता में सक्रिय। इन दिनों इंडिया न्यूज में एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर। टीवी टुडे ग्रुप, न्यूज 24, इंडिया टीवी, न्यूज नेशन, दैनिक जागरण और दैनिक भास्कर जैसे तमाम मीडिया संस्थानों से पत्रकारिता का अनुभव बटोरा। उनसे 8826972867 पर संपर्क किया जा सकता है.psinghjournalism@gmail.com

 

 

 

 

 

 

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