अक्टूबर में पाठशाला, जनवरी में पुस्तकालय

अक्टूबर में पाठशाला, जनवरी में पुस्तकालय

ब्रह्मानंद ठाकुर

30 जनवरी को देश ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 70वीं पुण्यतिथि मनाई । दिल्ली से लेकर देश के तमाम हिस्सों में श्रद्धांजलि सभाएं हुईं । लेकिन उससे ज्यादा जरूरत है कि हम बापू आदर्शों को व्यवहारिक जीवन उतारें । टीम बदलाव बापू  दिखाए रास्ते पर कुछ कदम चलने की कोशिश में जुटी है । गांव में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार को लेकर टीम बदलाव ने एक छोटी सी पहल पिछले साल 2 अक्टूबर गांधी जयंती के मौके पर की । चार महीने से चल रही इस पाठशाला में बच्चों के शिक्षा से जुड़ी जरूरतों को पूरा करने की कोशिश की जा रही है । टीम बदलाव के साथियों की मदद से हमने बदलाव पाठशाल के साथ बदलाव पुस्तकालय की शुरुआत भी कर दी है ।

टीम बदलाव के पास संसाधनों की कमी जरूर है, लेकिन हौसले की नहीं । लिहाजा हमने पाठशाल के पास बनी घर की आलमारी को बदलाव पुस्तकालय के लिए समर्पित कर दिया । आलमारी के रिपेयर में 3 हज़ार रुपये  का खर्च आया है ।  शुरुआत के लिए मैंने अपनी 45 साल से संग्रहित करीब एक हजार पुस्तकों में से बच्चों के उपयोग की 21 किताबें लाइब्रेरी में रख दी है । कुछ साथियों ने बालोपयोगी पुस्तकों का इंतजाम करने का भरोसा दिया है ।उम्मीद है कि जल्द ही गांव के इन बच्चों के लिए आलमारी किताबों से भरी नजर आएगी और बच्चे उससे अपना ज्ञान बढ़ा सकेंगे ।

पिछले महीने मुजफ्फरपुर के युवा समाज सेवी किसलय कुमार ने बदलाव पाठशाला की तारीफ करते हुए उपेक्षित लेकिन अपेक्षित इन बच्चों के लिए यूनिफॉर्म का प्रपोजल दिया और आर्थिक सहायता के रूप में कुछ पैसे पाठशाला के लिए भेज दिये । जिसके जरिए बदलाव पाठशाला के बच्चों की ड्रेस तैयार की जा रही है, जो जल्द ही बच्चों को मिल जाएगी ।

इस बीच बच्चों के लिए बंदरा के प्रखंड विकास अधिकारी विजय कुमार ठाकुर ने भी टीम बदलाव की इस मुहिम से जुड़ने की इच्छा जाहिर की है । कुछ लोग आर्थिक सहायत के लिए भी आगे आ रहे हैं, लेकिन मेरी कोशिश है कि आर्थिक सहायता से ज्यादा बच्चों को पठन सामग्री से जुड़ी चीजें मुहैया कराई जाएं तो बेहतर है, सुविधा से ज्यादा शिक्षा से जुड़े संसाधनों की जरूरत है, जो गरीब बच्चों को आगे बढ़ने में मदद कर सके ।

पिछले चार महीने से बदलाव पाठशाला के संचालन की वजह से हमारे गांव में खासकर मेरे आसपास के माहौल में काफी बदलाव आया है, कल तक जो बच्चे स्कूल जाने में कतराते थे आज वो स्कूल भी जाते हैं और शाम के वक्त बदलाव पाठशाला में भी आते हैं, अगर किसी दिन शिक्षक ना भी हो तो बच्चे आपस में एक दूसरे को पढ़ाते नजर आते हैं। बदलाव पाठशाला के संचालन में मेरा पौत्र भी मेरे कदम से कदम मिलाकर चल रहा है । मुझे खुशी है कि बचपन से मेरी जो समाज में सार्थक बदलाव की सोच रही है अब वो मूर्त रूप ले रही है और हमारी नई पीढ़ी उस सोच को आत्मसात भी करने की कोशिश कर रही है ।

बदलाव पाठशाला की परिकल्पना के पीछे ग्रामीण शिक्षा को लेकर बापू की सोच की छाप छिपी है । गांधीजी के दिखाए रास्ते पर चलने का टीम बदलाव का ये एक छोटा का प्रयास भर है, जिसे हम पूरा करने की हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं।


ब्रह्मानंद ठाकुर। बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। गांव में बदलाव को लेकर गहरी दिलचस्पी रखते हैं और युवा पीढ़ी के साथ निरंतर संवाद की जरूरत को महसूस करते हैं, उसकी संभावनाएं तलाशते हैं।

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