दुष्यंत के शहर में, दुष्यंत की तासीर अभी बाक़ी है !

दुष्यंत के शहर में, दुष्यंत की तासीर अभी बाक़ी है !

राजेश बादल
एक सितंबर को दुष्यंत कुमार संग्रहालय में सबने दिल की गहराइयों से दुष्यंत को याद किया। रात देर तक सोचता रहा कि चालीस बरस पहले उन्होंने अपनी रचनाओं से जिस तरह क्रान्ति -संसार रचा था ,वह बेमिसाल था। क्या उनके शहर में अभी उनकी तासीर बाक़ी है ? इस सवाल का उत्तर कल ही श्री अशोक निर्मल से प्राप्त उनके संग्रह गाँव कुँआरे रह गए में मिल गया क्या माल का संग्रह है, क्या भाव हैं, क्या शब्द हैं और क्या बिंब हैं। सबसे बड़ी बात अशोक कहते हैं कि उन्होंने तो दुष्यंत को देखा भी नहीं, लेकिन मेरी पीड़ा दुष्यंत की नहीं तो उनसे कम भी नहीं है। यानी धड़कते हुए लोकतंत्र की गारंटी। किस किस रचना का या ग़ज़ल का उल्लेख करूँ – सारी एक से बढ़कर एक हैं। फिर भी चंद नमूने यहाँ प्रस्तुत हैं – 

हम बिकाऊ नहीं, किन्तु बेचे गए /हर क़दम पर हमारी लगी बोलियाँ /झुग्गियों को हवेली निगलती रही /रोज़ बच्चे उगलती रहीं खोलियाँ / भीख़ माँगी तो गलियों में गाली मिली/ भूख़ चीख़ी, दनादन मिली गोलियाँ /सितारा ग़ज़ल के नाम पर ही इस संग्रह का नाम लगता है। नमूना देखिए – 
मेंहदी वाले ख़्वाब आज, फिर बाँह पसारे रह गए /शहर ने सौ सौ ब्याह रचाए /
गाँव कुँआरे रह गए / सुख सुविधा की हर शहनाई /डामर के चौराहों पर / पगडंडी के हाथ में केवल / झंडे नारे रह गए / वेतन बँटते बँटते बाबू /बँट जाता है हिस्सों में /बच्चों के हिस्से में फिर से/चाँद सितारे रह गए / सब तो लिखना संभव नहीं ,पर कुछ ग़ज़लों के टुकड़े ज़रूर आपका ध्यान खींचेंगे।

मसलन – आग नफ़रत की लगाईं जा रही है/घास को तीली दिखाई जा रही है/बुनियाद के पत्थर तो हिलने से रहे/बेवजह गुंबद हिलाई जा रही है/  इसी तरह – 
चंदा अपने गाँव में /रखना हमको छाँव में /जबसे आए शहर में /रहने लगे तनाव में /पेट पीठ मिल एक हुए /आँतें रहें दबाव में / कुछ और उजियारों की तानाशाही का क़िस्सा बतलाते हैं /चाँद सितारे सब क़ैदी हैं, बस जुगनू चिल्लाते हैं /जो नहीं शामिल हुए अनुयाइयों में /नाम उनका लिख दिया दंगाइयों में जोअसहमत हैं चमकती नीतियों से /उनको फेंका जा रहा है खाइयों में /शव किसानों के यहाँ लटके मिलेंगे /छाँव मिलती ही नहीं अमराइयों में /ये पौधे जल रहे हैंआज भी भरपूर पानी में /कमी कुछ रह गई शायद हमारी निगेहबानी में /भर दिया कैसा नशा ये नौजवानी में /अंतर नहीं कर पा रहेअबआग-पानी में /वह अशोक जी ! सलाम।

राजेश बादल / वरिष्ठ पत्रकार, तीन दशक से ज्यादा वक्त से पत्रकारिता जगत में सक्रिय, राज्यसभा टीवी, वाइस ऑफ इंडिया समेत तमाम टीवी चैनलों में वरिष्ठ भूमिका निभा चुके हैं, देश के चर्चित अखबारों में भी काम कर चुके हैं । इनदिनों स्वतंत्र पत्रकारिता में मशगुल ।

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