ध्यानपुर धाम में आपका स्वागत है!

ध्यानपुर धाम में आपका स्वागत है!

अंकिता चावला प्रुथी

गुरुदासपुर ज़िले का एक छोटा-सा कस्बा है ध्यानपुर। कस्बा छोटा है पर इस का नाम पंजाब, हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर के कई लोगों के लिए ख़ास मायने रखता है। हमें अमृतसर पहुंचने से पहले ध्यानपुर ही जाना था। पंजाब और हरियाणा में कई धार्मिक गुरुओं का डेरा है। इनमें से एक गुरु बावा लाल जी का आश्रम या मंदिर कहें वो यहीं है।

वैसे मैं वहां पहले एक ही बार गई थी अपने मम्मी-पापा और बहन के साथ। तब मैं कॉलेज में पढ़ रही थी। मुझे अच्छे से याद है तब हम पहले ट्रेन से अमृतसर पहुंचे थे और बस से उतरते ही मुझे जिसने अपनी तरफ़ खींचा वो था- सोनी टीवी पर आने वाला नया सीरियल ‘ जस्सी जैसे कोई नहीं ‘ की बड़ी से होर्डिंग। इसमें बड़ा-सा चश्मा लगाए, दांतों में तार दिखाती एक लड़की को फ़ोकस किया गया था। साथ में अपूर्व अग्निहोत्री और रक्षांदा ख़ान और गौरव गेरा की भी तस्वीर थी। मैं बस उस होर्डिंग को देखे जा रही थी। उसी होर्डिंग के सामने कई वेज-नॉन वेड ढ़ाबे थे। दोपहर का वक़्त था तो हमने जल्दी से खाना खाया और फिर ज़्यादा वक़्त गंवाए बगैर हमने बस अड्डे से बटाला की बस पकड़ी।

हमें किसी ने बताया था बटाला से ध्यानपुर ज़्यादा दूर नहीं है। उन दिनों अमृतसर में भयंकर प्रदूषण हुआ करता था। डीज़ल से प्रदूषण फैलाती उन रोडवेज़ की बसों की हालत बहुत बुरी थी। छोटी-छोटी बसें और उनकी तंग सीटें। बस की छत पर सवार बेपरवाह मुसाफ़िर। एसी तो दूर की बात थी। खुली खिड़कियों से डीज़ल की गंध मेरा सिर दुखाने लगी थी। अब धीरे-धीरे शाम होने लगी थी। वो बस खेतों और उनके बीच पड़ते गांवों की सड़कों से हिचकोले खाते हुई गुज़र रही थी। तभी कंडक्टर ने आवाज़ लगाई बटाला वाले आ जाएं। बस रुकी और हम उस जगह पर उतर गए।

मुझे याद नहीं उस जगह का नाम क्योंकि आसपास ना तो कोई बोर्ड था और ना ही भीड़-भाड़। सिर्फ़ दो-तीन दुकानें दिखीं और कुछ ईंटों से बने हुए घर। हमें थोड़ा-सा डर लगने लगा कि कहीं हम ग़लत जगह तो नहीं आ गए। हमारा डर सही साबित हुआ जब वहां पास की दुकान पर काम कर रहे एक आदमी ने बताया कि आपको दूसरी जगह उतरना चाहिए था, लेकिन इसका उपाय क्या था? उसने कहा, थोड़ी देर में एक और बस आएगी आप उस बस में चले जाएं। क्योंकि सूरज डूबने लगा था इसलिए मुझे डर लगने लगा था। मैंने पापा से साफ़-साफ़ कहा- “ पापा हम बस में नहीं जाएंगे, आप यहां से टैक्सी कर लो। हमारे पास सामान भी है। अब देर हो रही है, कितनी सुनसान जगह है। आगे बस कहां उतारेगी, हमें क्या मालूम? ”

पापा को भी लगा कि देर हो रही है तो हम टैक्सी कर ही लेते हैं। हमें नज़दीक से ही एक टैक्सी मिल गई। उसने सात सौ रुपए मांगे थे। हमने डिक्की में सामान रखा और एक-एक कर हम चारों गाड़ी में बैठ गए। थोड़ी दूर तक तो रास्ता ठीक था लेकिन कुछ तीन-चार किलोमीटर के बाद दोनों और खेत थे और एक संकरी रोड पर हमारी टैक्सी चले जा रही थी। मुझे एक बार फिर डर लगने लगा क्योंकि अब अंधेरा हो चुका था। सुनसान जगह थी और मम्मी-पापा दोनों के पास ठीक-ठाक कैश भी था। उन दिनों क्रेडिट कार्ड या डेबिट कार्ड का चलन तो था नहीं। मैंने मम्मी को अपना पर्स अच्छे से संभाल कर रखने को कहा। चारों तरफ़ सन्नाटा पसरा हुआ था। बस एक दिल ही था जो ज़ोर-ज़ोर से धुक-धुक शोर मचाए जा रहा था। मैं भगवान का नाम जपे जा रही थी कि इतनी देर में टैक्सी ड्राइवर ने कहा – “ बस अब ज़्यादा दूर नहीं है… वो सामने ही है बावा लाल जी का मंदिर “ जैसे ही उसने ये कहा मेरी जान में जान आई।

हम रात के करीब आठ बजे वहां पहुंचे और वहीं पर रात को ठहरने का हमारा इंतज़ाम किया गया। वहां पर कई लोग रात को ठहरे हुए थे। कई छोटे-छोटे बच्चों को लेकर आए थे। वो पंजाबी में कहते हैं ना मत्था टिकाना। शायद मन्नत पूरी होने के बाद मत्था टिकाने लाए थे। हम वहीं एक कमरे में ठहरे और सुबह दर्शन का इंतज़ार करने लगे। लेकिन इस बार हमें दर्शन सुबह नहीं बल्कि शाम में ही करने थे। “ देखो पिछली बार हम बटाला से गए थे और इस बार हम दिल्ली से सीधा आ रहे हैं तो वहां जाने का रास्ता अलग ही होगा ना।” हमने अपना जीपीएस ऑन कर लिया और अमृतसर से करीब एक घंटा पहले एक जगह पड़ती है, हम जीपीएस के मुताबिक हाईवे को छोड़ते हुए दाएं हाथ की तरफ़ मुड़ गए। पिछली दफ़ा जीपीएस नहीं था तो ग़लत जगह पहुंचे थे और इस बार जीपीएस होने के बावजूद भी हम ग़लत जगह पहुंच गए। फिर किसी राहगीर ने हमें बताया कि पहले बटाला आएगा उसके बाद ध्यानपुर आएगा।

हम सिंगल रोड पर चले जा रहे थे। सड़क पर घने पेड़ों की धूप-छांव का खेल चल रहा था और मन को बाग-बाग कर रही थी खेतों की हरियाली। वैसे इस बार जीपीएस भी ठीक निकला। खेतों के बीच एक बड़े से द्वार पर जब लिखा देखा —‘ ध्यानपुर धाम में आपका स्वागत है’ ये ॉठीक वैसा ही था, जैसे किसे भटके हुए राही को कारवां मिलना। उस दरवाज़े से गुज़रते हुए हम आगे कस्बे में जा पहुंचे। वो वहां की लोकल मार्किट थी। काफ़ी भीड़ थी, संकरी गलियां और उन गलियों में से गुज़रती हुई गाड़ियां हमें हैरत में डाल रही थी। अब आप ये मान लीजिए की संदीप का असली ड्राइविग टेस्ट वहीं होना था। हम उन गलियों से जैसे-तैसे निकलकर एक हल्की चढ़ाई वाले रास्ते पर चढ़ गए। ये रास्ता सीधे धाम में जाता था। हम बिलकुल वक़्त पर पहुंचे थे…क्योंकि हमारे दर्शन करते ही मंदिर के कपाट बंद कर दिए गए। ख़ैर हमें सुकून था कि हमारी सालगिरह वाले दिन दर्शन हो गए नहीं तो सुबह तक का इंतज़ार करना पड़ता। दर्शन करके हमने प्रसाद लिया और फिर बढ़ चले अपने दूसरे पड़ाव की ओर।


ankita profileअंकिता चावला प्रुथी। दिल्ली में पली बढ़ी अंकिता ने एक दशक से ज्यादा वक्त तक मीडिया संस्थानों में बतौर एंकर और प्रोड्यूसर कई शानदार शो किए। इन दिनों स्टुडियो जलसा के नाम से अपना प्रोडक्शन हाउस चला रही हैं। टोटल टीवी, न्यूज नेशन और सहारा इंडिया चैनल में नौकरी करते हुए मीडिया के खट्टे-मीठे अनुभव बटोरे।