चुनावी समर के बीच ‘स्वप्नलोक’ में ‘योगी’ से साक्षात्कार

चुनावी समर के बीच ‘स्वप्नलोक’ में ‘योगी’ से साक्षात्कार

ब्रह्मानंद ठाकुर

कभी-कभी सपने भी अजीब होते हैं। अजीब इसलिए कि ऐसे सपनों के कोई हाथ-पैर नहीं होते और यथार्थ से दूर दूर तक इनका कोई रिश्ता नहीं होता। आजकल बहुत बीमार हूं सो डॉक्टर ने शय्या विश्राम की सलाह दे रखी है। उस सलाह का मैं पूरी तरह अपनी क्षमता के अनुरूप पालन कर रहा हूं सो उसी तिनटंगा चौकी पर ( घोंचू उवाच सिरीज लेखों के दौरान आप इस तिनटंगा चौकी से जरूर अवगत हुए होंगे ) सोया रहता हूं।और जब दिनभर सुतले रहना हय त सपना आने से कौन रोक सकता है ? तो गाढी नींद में था। सपने में देखा कि मुख्यमंत्री माननीय योगी आदित्य नाथ जी बिहार के अंतिम चरण के चुनाव प्रचार के लिए आए हुए हैं। इसी सिलसिले में बिना किसी तामझाम के वे हमारे आम के बगीचे में पधारे और बिना फल वाले बेशुमार किसलय से लदे रसाल वृक्ष को घूम-घूम कर देख रहे हैं और बिना फलों के पेडों को देख उनका मन खुद ब गद-गद हो रहा है।

मुझे ज्योंही सूचना मिली की कोई संत हमारे बगीचे में घूम रहे हैं तो मैं बगीचे की ओर दौड़ा। देखा ये तो साक्षात योगी आदित्य जी हैं। यह क्षण मेरे लिए अविश्वसनीय सच था। मैंने झट श्रद्धा से योगी जी के चरणों पर दंडवत होते हुए अपना सिर रख दिया। उन्होंने तुरत मेरी बांह पकड़ कर स्नेह से उठाते हुए खड़ा कर दिया। ‘अहोभाग्य ! योगी जी इस बांह पकड़े की लाज जरूर निभाइएगा ,अगर अगले बिहार विधान सभा के चुनाव में मुझको टिकट दिलवा दीजिएगा तो मेरा भी जीवन धन्य हो जाएगा ‘मन ही मन मैंने योगी आदित्य नाथ जी से विनती की और उनके साथ बगीचे का चक्कर लगाने लगा। योगी जी तेज कदमो से चल रहे थे लिहाजा मैं अपना 80 किलो वजनी शरीर लिए दौड़ कर उनके साथ हो लेता तब वे मुस्कुरा देते थे। उनकी मुस्कुराहट देख मुझे लगा कि मैं एकसाथ अर्थ, धर्म काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थ पा गया हूं। मेरे मन में एक लालसा जगी,योगी आदित्य नाथ जी से इंटरव्यु लेने की, कुछ खास बतियाने की। सो मैंने भी अपने मन की बात उनके सामने विनम्र भाव से करबद्ध होते हुए रख दी। उन्होंने कहा- संकोच किस बात का ? जो पूछना हो पूछो। बस मेरा दिल बांसो उछलने लगा। मैंने योगी जी से पहला सवाल किया- लोग राजनीति को काजल की कोठरी कहते हैं, आप इसमें कैसे आये ?

उत्तर- कैसे आदमी हो ? थोड़ा भी इतिहास का ज्ञान नहीं रखते । प्रागैतिहासिक काल से ही यह परम्परा अपने देश में चली आ रही है। राजा दशरथ के गुरू वशिष्ठ थे, उन्हीं की सलाह पर राजा कठिन से कठिन समस्याओं को चुटकी बजाकर हल कर लेते थे। प्रजा खुश थी द्वापर में योगिराज कृष्ण का इतिहास नहीं पढे। उन्होंने भी तब की राजनीति को दिशा दी थी। और चाणक्य ? आज का बच्चा भले ही चाणक्य का नाम तक नहीं जानता हो लेकिन उसी चाणक्य ने नन्द वंश का समूल नाश कर गुप्त साम्राज्य की नींव डाली थी। आधुनिक काल में संत महात्मा जब से राजनीति से विलग हो गये तब से ही इस महान भारत देश में समस्याएं पैदा होने लगीं।
मै निरुत्तर। भला आगे क्या पुछूं, यह सोच ही रहा था कि गंगा की दुर्दशा का सवाल मेरे जेहन में पैदा हो गया।

मैंने अगला सवाल किया- गंगा की स्वच्छता और उसकी अविरलता कैसे पुनर्स्थापित होगी गुरुदेव ?
जवाब- ‘होगी, होगी, होगी, अवश्य होगीः गंगा हमारी मां है। और पुत्र भले ही कुपुत्र हो जाए, माता कुमाता नहीं हो सकती। वर्तमान पीढ़ी अपने करतूतों से गंगा की निर्मलता नष्ट कर रही है। मां गंगा मौन हैं। उसमें इतनी ताकत है कि वह अपनी निर्मलता और अविरला खुद बहाल कर लेगी। इतजार करो, वह दिन अब ज्यादा दूर नहीं। बस जरूरत गंगा के प्रति अपना भक्तिभाव बनाए रखो।
मेरा योगी आदित्य नाथ जी से अंतिम सवाल था, बिहार वासियों को आप क्या संदेश देंगे ? वे मेरे इस सवाल पर अपना मूंह खोले ही थे कि पोती आयुषी एक प्लेट में पका पपीता लिए हाजिर हुई- ‘बाबा पपीता खा लीजिए।’ बस मेरी नींद खुल गई। घड़ी देखा तो अपराह्न के चार बज चुके थे। मेरा इंटरव्यू अधूरा रह गया।

ब्रह्मानंद ठाकुर।बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। मुजफ्फरपुर के पियर गांव में बदलाव पाठशाला का संचालन कर रहे हैं।


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