प्रभात ख़बर के इतिहास से अविनाश ग़ायब क्यों हैं?

प्रभात ख़बर के इतिहास से अविनाश ग़ायब क्यों हैं?

निराला बिदेसिया

अभी कुछ दिनों पहले ही मन बनाया कि अचानक-अचानक एकदम से एफबी वगैरह से कुछ-कुछ दिनों के लिए दूर रहना है। खुद से निर्धारित समय के अनुसार अब सीधे एक जुलाई को ही एफबी पर आना था लेकिन अभी पांच मिनट पहले अपने अविनाश भाई से बात हुई तो ढेर सारी बातें जेहन में तैरने लगीं। अविनाश भाई अभी दिल्ली में हैं। विनीत भाई के यहां हैं। वहां उनकी नजर सफरनामा किताब पर पड़ी। उन्होंने बहुत ही साफ-साफ कहा कि इतिहास ऐसे लिखिएगा निरालाजी! बताइये पूरे प्रभात खबर के इतिहास से आपने कई जरूरी नामों को छोड़ दिया है, गायब कर दिया है।

अविनाश भार्इ् की यह पंक्ति खत्म हुई तो मन एकदम से कैसा-कैसा तो हो गया। उन्हें कुछ कह नहीं सका। कुछ कहने की स्थिति थी भी नहीं। इस किताब को संपादित मैंने ही किया है, इसका रूप-स्वरूप-प्रारूप भी मैंने ही तय किया है। यह अलग बात है कि कई जरूरी कंटेंट इसमें नहीं आ सके हैं, जिसके बिना कम से कम प्रभात खबर का इतिहास तो मुक्म्मल रूप में पूरा नहीं होता। उस जरूरी कंटेंट में से कई नामों का छूट जाना है, जिसमें एक प्रमुख नाम अविनाश भाई का है।

विनीत कुमार के बैचलर किचन का लुत्फ उठाते अविनाश

प्रभात खबर की पूरी यात्रा में अविनाश भाई एक ऐसी कड़ी के रूप में रहे, जो संपादक तो बहुत बाद में हुए, रविवार पत्रिका के प्रभारी भी रहे, सिनेमा पर जब दिवाली का विशेषांक निकला तो उसके संपादक रहे लेकिन उनकी मूल पहचान दूसरी रही। वह पहचान थी ‘लौटकर अविनाश’ वाली- ​जिससे जितनी पहचान अविनाश को मिली, उतनी ही एक नयी किस्म की पहचान प्रभात खबर को भी। हिंदी पत्रकारिता में मृतप्राय हो चुकी रिपोर्ताज विधा को अविनाश भाई ने प्रभात खबर के जरिये न सिर्फ जिंदा किया बल्कि जीवंतता के साथ उसे मजबूत करते रहे। उनकी पत्रकारिता के बारे में ढेरों बातें हैं।

इस किताब को संपादित किया था छह साल पहले, छपकर आयी एक साल पहले। जब छपकर हाथ आयी तभी से लगने लगा कि इतिहास लेखन में कई जरूरी तथ्य छूट गये हैं। कई बार प्रकाशक शर्माजी का फोन आया कि निरालाजी कुछ रिव्यू वगैरह कहीं हो, मैंने ज्यादा रूचि नहीं ली। वजह यही रही कि मुझे बार-बार लगता रहा कि इतिहास मुकम्मल रूप में सामने नहीं आ सका है। जब तक पेपरबैक संस्करण जरूरी संशोधन, जुड़ाव आदि के साथ आने की तैयारी नहीं होती है, तब तक थोड़ा मटियाए रहना ही ठीक है।

इसमें बहुत कुछ जरूरी छूट गया है। अविनाश भाई, राघवेंद्रजी जैसे कई जरूरी नाम। हालांकि अविनाश भाई, राघवेंद्रजी वगैरह से कई बार आग्रह भी किया था कि आपलोग प्लीज एक लेख लिख दीजिए, अपने संस्मरण दे दीजिए लेकिन इनकी व्यस्तता रही, ये लिख नहीं सके। बावजूद इसके मेरा मानना है कि एक संपादक के तौर पर मुझे अपने तरीके से इन चीजों को मैनेज कर कम से कम जरूरी चीजों को समेटना था।

अविनाश भाई से निजी रिश्ते की बात अलग है। वह तब से है जब गांव से पहली बार पटना गया था, इंटर में पढ़ता था। तब अविनाश भाई एक सिनेमा पत्रिका निकालने की धुन के साथ घूमते थे। पढ़ाई लिखाई में कम मन लगने के कारण मेरे लिए सबसे पसंदीदा काम यही था कि मैं भी उनके साथ घूमइया करूं। मैं भी उनके सााथ हो जाता था। प्रभात खबर से मेरे आरंभिक जुड़ाव के केंद्र में भी अविनाश भाई ही प्रमुखता से रहे। बीएचयू से पढ़ने के बाद पटना पहुंचा, इंटर्नशिप के लिए। हमारे कई साथी पटना हिंदुस्तान में चले गये इंटर्नशिप के लिए। मुझे अविनाश भाई मिल गये। तब वे प्रभात खबर में रविवार पत्रिका के संपादक हुआ करते थे। उनसे कहा कि इंटर्नशिप करना है, बोले कहां हिंदुस्तान के फेरे में पड़ रहे हैं, अपने राघवेंद्रजी पटना के संपादक हैं, जानदार आदमी हैं, उनके साथ हो जाइये, सीखने को प्रभात खबर में ही मिलेगा, राघवेंद्रजी जैसे संपादक के साथ ही मिलेगा, दूसरी जगह तो बस नाम का इंटर्नशिप करते रह जाइयेगा। हुआ वैसा ही। हालांकि ट्रेनिंग के बाद पहली नौकरी प्रभात खबर में नहीं की बल्कि दैनिक जागरण के साथ शुरुआत हुई।

यह तो दूसरी बात हुई। अभी यह पुरानी बात इसलिए याद आयी, क्योंकि अविनाश भाई ने जिस अधिकार से बोला कि आपने किताब संपादित की है और कई वजहों से इतिहास मुकम्मल नहीं बन सका है। कई चीजें छूट गयी हैं। लगा कि ऐसा ही तो रिश्ता होना चाहिए किसी से जो कम से सीधे सीधे, सपाट तरीके से बोल दे। हालांकि फोन रखने के पहले मैं अविनाश भाई को यह नहीं बता सका कि इतिहास लेखन का यह पहला अनुभव था, और इतिहास भी इतने बिखराव वाला था कि रोजमर्रा की पत्रकारितावाली नौकरी करते हुए ही इसे पूरा करते रहने की वजह से भी बिखरी हुई कुछ चीजें बिखरी ही रह गयीं, समेट न सका। अब अपनी ही संपादित चीजों को देखकर बहुत कुछ सीख रहा हूं।

(फेसबुक से साभार)


निराला बिदेसिया। बिहार के औरंगाबाद के निवासी। बीएचयू से उच्च शिक्षा। कई अख़बारों, पत्र-पत्रिकाओं में रहते हुए अपनी घूमक्कड़ी से रिपोर्टिंग और बातचीत का एक लहजा विकसित किया।
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