पुस्तक मेले में ‘ग़रीब कन्याओं’ का सामूहिक विवाह

पुस्तक मेले में ‘ग़रीब कन्याओं’ का सामूहिक विवाह

राकेश कायस्थ

पुस्तक मेले में किताबों का विमोचन जैसे गरीब कन्याओं का सामूहिक विवाह। गरीब मां की बेटियां हैं हिंदी की किताबें। एक ही मंडप में निपटा दी जाती हैं। इतने बाराती-घराती एक साथ फिर जाने कब इकट्ठा हों। वैसे कुछ शौकीन लोग भी होते हैं जो कहते हैं एक ही तो बिटिया है मेरी, वो भी मुरादों वाली। विवाह मतलब विमोचन होगा तो इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में और वो भी फलाने जी मंत्री के कर-कमलों से। लेकिन ऐसे लोग भी पुस्तक मेले में एक राउंड का विमोचन करवा लेते हैं, इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में वो थीम वेडिंग के लिए बाद में जाते हैं। ठीक उसी तरह जैसे 25 साल पुराने विदेशी शादी-शुदा जोड़े भारतीय रीति-रिवाज से शादी करने के लिए पुष्कर आते हैं।

पुस्तक मेले का फायदा ये है कि अलग से कोई जतन नहीं करना पड़ता है। बाराती-घराती, पंडित सब एक ही मंडप में मिल जाते हैं। चाय-पानी का खर्चा बच जाता है। कुछ गणमान्य कुछ दाता-दानी भी चले आते हैं। यही लोग घूम-घूमकर हरेक मंडप में कन्याओं को बारी-बारी से आशीर्वाद देते नज़र आते हैं। विवाह संपन्न कराने वाले पंडों की डिमांड खूब रहती है और सप्लाई भी। आलोचक नोटरी पब्लिक की तरह सुलभ होते हैं। एक ही तरह का मंत्रोचार, एक तरह से आशीर्वाद- हिंदी का सन्नाटा टूटा है। मुझे अफसोस है कि इनकी किताब पहले क्यों नहीं पढ़ी। वगैरह-वगरैह।

कुछ पत्रकार, कुछ लेखक। पुस्तक मेले में 15 जनवरी को पुष्यमित्र के उपन्यास ‘रेडियो कोसी’ का विमोचन होना है। फोटो सौजन्य- मधुरेंद्र

मेरी मित्र सूची में ढेरो लोग अंग्रेजी वाले भी हैं। पुस्तक मेले की चर्चा वहां भी है। लेकिन उस तरह नहीं जिस तरह हिंदी वाली मंडली में है। जो फर्क समझ में आता है वो ये कि अंग्रेजी वालों में ज्यादातर पाठक हैं। हिंदी वालों में थोड़े-बहुत पाठक भी हैं, बाकी या तो लेखक हैं या समीक्षक। लेखक की अंधेरी दुनिया को कम पैसे में या एकदम निशुल्क प्रकाशित करते प्रकाशक भी खूब है। कमियां हर समाज की होती है।

यह मानना पड़ेगा कि जो उत्सवधर्मिता हिंदी के समाज में है, वह कहीं और नहीं है। किताबें कितनी बिकती हैं, इन्हे कौन खरीदता है, यह एकदम अलग विषय है। मैं विश्व पुस्तक मेले को एक सांस्कृतिक उत्सव के रूप में देखता हूं। कागद-कारे करने वालों का एक ऐसा प्लेटफॉर्म जो उन्हे थोड़ी बहुत पहचान, थोड़ा सम्मान और अपने होने का एहसास दे जाता है। मेरे अनगिनत दोस्तों की किताबें इस साल पुस्तक मेले में आई हैं। तमाम बड़े, छोटे, पुरस्कृत, तिरस्कृत और बहिष्कृत लेखकों को ढेरो बधाइयां। कारंवा यूं ही आगे बढ़ता रहे। लेखक डटे हुए हैं, इसलिए उम्मीद जिंदा है। आइये हिंदी जगत की चिर-परिचत कृपणता से उपर उठकर खुले-दिल से एक-दूसरे का हौसला बढ़ायें। रही बात किताबों की तो क्या कहूं सिवाय इसके कि .. बाबुल की दुआएं लेती जा, जा तुझको सुखी संसार मिले।


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राकेश कायस्थ।  झारखंड की राजधानी रांची के मूल निवासी। दो दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय । खेल पत्रकारिता पर गहरी पैठ, टीवी टुडे,  बीएजी, न्यूज़ 24 समेत देश के कई मीडिया संस्थानों में काम करते हुए आपने अपनी अलग पहचान बनाई। इन दिनों स्टार स्पोर्ट्स से जुड़े हैं। ‘कोस-कोस शब्दकोश’ नाम से आपकी किताब भी चर्चा में रही।

One thought on “पुस्तक मेले में ‘ग़रीब कन्याओं’ का सामूहिक विवाह

  1. हमारे मुजफ्फरपुर शहर के गरीब स्थान मंदिर के पंडित एक ही साथ आठ -दस यजमानो को सत्यनारायण भगवान की पूजा का मंत्र पढा कर पूजा सम्पन्न करा देते है लेकिन दक्षिणा भरपूर लेते हैं ।उसी तर ह आपके दिल्लु पुस्तक मेले मे भी एट -दो प्रायोजित विद्वान लेखकों की पुस्तकों का लोकार्पण कर देते होंगे ःलोकार्पण का सहज और सरल रास्ता !

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