बंसी कौल के लिए थिएटर ही रहा पहला और आखिरी परिवार

बंसी कौल के लिए थिएटर ही रहा पहला और आखिरी परिवार

अंजना पुरी

एक रिश्ते के अड़तीस बरस बीत गए और आज पहली बार यह समझ में आ रहा है कि एक साथी का जाना क्या होता है एक गुरु का हाथ सर पर से उठ जाना क्या होता है और एक ऐसे व्यक्ति का, जो हमेशा भौतिक रूप से मौजूद था, पास में था, अचानक ही उसका चला जाना क्या होता है। लेकिन हाँ, यह व्यक्ति बंसीजी… एक ऐसे मार्गदर्शक थे जिन्होंने हमेशा सिखाया कि जीवन को कैसे हँसकर जीया जाये, आड़े आ रही कठिनाइयों का कैसे हँसकर और डटकर सामना किया जाये। उनका विश्वास था कि हँसना सबसे प्रभावशाली हथियार है। ज़िंदगी के सफ़ेद पर्दे पर अनगिनत रँगों का छिड़काव उनके नाटकों में दिखता है।

सच है… उनके नाटक, मंच के canvas पर रँगों का एक ऐसा palette रहा है, जिसके रंग एक जगह नहीं टिकते, बल्कि तरल हैं, घूमते है, और अपनी अस्थिरता ही से अनगिनत बिम्ब रचाते हैं, प्रतिबिम्ब बनाते हैं। यह छिड़काव उनकी ज़िंदगी का भी अटूट हिस्सा था। रँगों के छलकते आकार मन में थे, मंच पर थे और ज़िंदगी में थे ही। इन रंगों से अटूट स्नेहिल रिश्ते बने, दोस्तियाँ बनीं, अनंत सौहार्द बना। बंसीजी हमेशा कहते थे कि दो परिवार होते हैं… एक वह जिसका रिश्ता खून का है, जो जन्म से बनता है, जो प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से हमेशा-हमेशा साथ रहता है। उनका स्नेह, उनका आशीर्वाद हम पर हमेशा बना रहे।

दूसरा वह परिवार है जो रंगमंच हमारे लिए बनाता है। यहाँ हमें अपने अस्तित्व का प्रमाण नहीं देना पड़ता है… अपने होने की सफाई नहीं देनी पड़ती। यहाँ ये नहीं पूछा जाता है कि किस जात के हो… व्यवसाय क्या है… किस समाज का हिस्सा हो… किस तबके के हो…। इन सबका रंगमंच में कोई मायना नहीं है, उससे कोई वास्ता नहीं है। रंगमंच का जब द्वार खुलता है तब वह बिना प्रश्न किये सब के लिए खुलता है। और यही रंगमंचवाला परिवार अंत तक बंसीजी के साथ रहा। रंग विदूषक परिवार के सदस्यों की सेवा अभूतपूर्व रही है। उन सभी सदस्यों को यह मालूम नहीं है, कि जब बंसीजी होश में थे, बोल पा रहे थे, तब उन्होंने मुझसे हाथ जोड़कर रोते-रोते कहा कि सब को मेरा धन्यवाद कहना।

और सच है… मुझे नहीं मालूम कि उन सभी माओं को मैं कैसे धन्यवाद कहूँ जिन्होंने हमें… रंगमंच को… हम दोनों को… ऐसे बच्चे उधार दिये जो अनमोल से अनमोल हैं। जन्मों तक मैं कर्जदार रहूँगी। कब लड्डू और किरपा हमारे बेटे बन गये, कब बीना और मंजरी परिवार का हिस्सा बने; कब आरती के बच्चे हमारे नवासे बन गये; कब उर्मिला आयी और गयी; कब राम-अनुज बड़े हुए; कब रिदा और वाणी बड़ी हुईं; पूरवा, गुड़िया और मीठू कब बड़ी हुईं; कब रंग विदूषक के बच्चे बड़े हुए और अभिभावक बन गये; यह सब कब हुआ, पता ही नहीं चला। रंग विदूषक का एक-एक सदस्य हमारे जीवन का अटूट हिस्सा है और हमेशा रहेगा। यही परिवार है। हम दोनों धन्य हुए।

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