बंसी कौल की स्मृति में रंग-दस्तक

बंसी कौल की स्मृति में रंग-दस्तक

राकेश मालवीय

स्मृतियां जब दस्तक देती हैं तो आपको हंसाती हैं, रुलाती हैं, गुदगुदाती हैं, कुछ जोड़ती हैं, कुछ घटाती हैं, कुछ पुराना याद दिलाती हैं, कुछ नया करने को प्रेरित करती हैं। स्मृतियों की ऐसी ही दस्तक तब महसूस की गई, जब भोपाल में माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय की सांस्कृतिक संस्था दस्तक के कुछ साथियों ने पद्मश्री बंसी कौल को याद किया। दस्तक की पहल पर बेहद अनौपचारिक माहौल में बंसी कौल जी के बहाने रंगकर्म के उन तमाम पहलुओं पर बातचीत हुई, जिससे हमारे आपके दिलों में बंसी कौल को कुरेदा जा सके।भोपाल में विकास संवाद के हॉल में सुबह 11 बजते-बजते एक-एक कर कई रंगकर्मी साथी जुट गए। वरिष्ठ रंगकर्मी फरीद बज्मी का बंसी कौलजी से लंबा नाता रहा है। फरीद बज्मी ने बताया कि बंसीजी ने उस हंसी पर काम किया, जो इंसान को अलहदा बनाती है। उन्होंने कहा कि बंसी कौल मानते थे कि हमसे सब कुछ छीना जा सकता है लेकिन हमारी हंसी कोई नहीं छीन सकता। हमारी हंसी पर कोई बैन नहीं लगा सकता। फरीद बज्मी ने बताया कि बंसी कौल ने रंगकर्म के लिए नए-नए स्पेस तलाशे और उनके मुताबिक अभिनेताओं को तराशा।

रंग विदूषक और दस्तक के बीच सेतु की तरह जुड़े रंगकर्मी पशुपति शर्मा ने आखिरी दिनों में बंसी कौल जी से जुड़ी यादें साझा की। दस्तक की पहली प्रस्तुति राम सजीवन की प्रेम कथा के मुख्य अतिथि के तौर पर बंसी कौल का नाता संस्था से जुड़ा। इसके बाद हमेशा दस्तक को बंसी कौल जी का मार्गदर्शन मिलता रहा। उन्होंने बताया कि बंसी कौल चाहते थे कि रंग-पत्रिकाओं, रंग समीक्षा के डॉक्यूमेंटशन को लेकर काम होना चाहिए, इस पर बात होनी चाहिए। विकास संवाद के वरिष्ठ साथी सचिन जैन ने कहा कि थियेटर का मकसद है समाज के अलग-अलग तबकों के बीच संवाद बनाना। इस संवाद के लिए रंगकर्म में काफी गुंजाइश है। उन्होंने कहा कि रंगकर्म में जुड़ाव की असीम संभावनाएं हैं, जिसे हम सभी को तलाशना होगा, आजमाना होगा।

हरि प्रसाद अग्रहरि जी ने कहा कि हम बंसी कौल जी से जितना कुछ हासिल कर सकते थे, अफसोस वो नहीं कर पाए। प्रशांत ने कहा कि बंसी कौल जी ने उन्हें बच्चों के साथ नाटक के लिए प्रेरित किया। बाल रंगमंच को लेकर उनके मन में कई तरह की योजनाएं चल रहीं थीं, जिसे आगे बढ़ाना है। मोहन जोशी ने बताया कि अंजना पुरी जल्द ही भोपाल में बच्चों को लेकर एक बड़ी परियोजना पर काम कर रही है। बंसी कौल जी ने आखिरी दिनों में जो कुछ नोट्स अंजना जी को दिए हैं, उसे जल्द ही जमीन पर उतारा जाएगा।

मोहन जोशी आखिरी दिनों में बंसी कौलजी के साथ रहे। उन्होंने बताया कि लॉकडाउन के दौरान बंसी दा अलग तरह से नाटक किए जाने की बात किया करते थे। वो कहते थे, सोसायटी की बॉलकनी में दर्शक रहें और नीचे रंगकर्मी नाटक करें। मोहन ने डिजाइनर और लोक कलाओं के चिंतक बंसी कौल को याद किया। रवि दुबे ने बताया रंगमंच में मैनेजर की अहम भूमिका होती है और वो इस काम के लिए तैयार हैं। सचिन श्रीवास्तव ने बताया कि रंगकर्म ने उनकी अराजकता को रचनात्मकता में बदला। उन्होंने मीडिया में रंगकर्म, साहित्य, संस्कृति के लिए घटते स्पेस पर भी चिंता जाहिर की। अनुराग द्वारी ने दस्तक के पुराने दिनों को याद किया। उन्होंने कहा कि आज से दो दशक पहले भोपाल की सक्रियता का असर कैंपस पर भी था। गुलदी हों, बंसी कौलजी हों, विभा जी हों… दस्तक के साथियों का एक नाता भोपाल के वरिष्ठ रंगकर्मियों से बना और इसका फायदा पूरे समूह को मिला। कीर्ति ने कहा कि बंसी कौल को हम मास्टर ऑफ स्टेज क्राफ्ट और एक्सप्लोरर ऑफ ह्यूमर के तौर पर याद करते हैं। राकेश मालवीय ने बंसी कौल की रिश्ते बनाने और निभाने की तासीर को रेखांकित किया। विजय शुक्ला ने कहा कि ऐसी हस्तियों के होने से पूरे रंगमंच को काफी ऊर्जा मिलती है।

स्मृति पथे ने कहा कि बंसी कौल जी की प्रस्तुतियों में हतप्रभ कर देने वाला प्रभाव हुआ करता था। स्मृति ने तुक्के पर तुक्का का जिक्र किया और डिजाइन को लेकर बात की।कार्तिक शर्मा ने कहा कि बंसी कौल जैसी शख्सियत को देखकर, उनके आस-पास होने के एहसास भर से वो अभिभूत हो जाया करते थे। उन्होंने जिस बात का जिक्र किया, उसका बंसी कौल जी के व्यक्तित्व से गहरा नाता रहा है- दोस्त बनाना और दोस्ती निभाना। प्रसून ने कहा कि रंगकर्म ने उन्होंने मुश्किल दिनों में एक सकारात्मक होने का एहसास दिया। उन्होंने कहा कि समाज में रंगकर्म की अहमियत इस मायने में ज्यादा है कि वो आपमें एक तरह का सार्थकता बोध जगाता है। रंग-दस्तक का समापन कुछ गीतों के साथ हुआ। दो मिनट के मौन के दौरान बंसी कौल की यादें दिलों में कैद हो गईं, कुछ संकल्प लिए गए।

बंसी कौल के स्मृति उत्सव में महज 24 घंटे के भीतर भोपाल में ये दूसरा आयोजन हुआ। शनिवार की शाम रंगश्री लिटिल बैले ट्रुप के सभागृह में बंसी कौल से जुड़ी प्रदर्शनी लगाई गई थी। स्मृति उत्सव के तौर पर रंग-विदूषक के साथियों ने अपने गुरु को याद किया तो रंगप्रेमियों ने बंसी कौल के न होने के मायने बताए।

इलाहाबाद में रंग प्रेमियों ने मनाया बंसी दा की स्मृतियों का उत्सव बंसी कौल के लिए थिएटर ही रहा पहला और आखिरी परिवार बंसी कौल को कहाँ ढूंढे रे बंदे? गुरु बंसी कौल ने अपने गुरु से यूं जोड़ दिया नाता अपने गुरु से नाता जोड़, कहां गए मेरे गुरु हमको छोड़ ‘साक्षात्कार अधूरा है’- गुरु से गुरु तक की यात्रा

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