स्कूलों में न हो सूट-बूट का हव्वा- जनकवि गिर्दा

पुरुषोत्तम असनोड़ा

इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद बहस चल रही है कि सबको सामान शिक्षा मिले। नेता, अधिकारी, कर्मचारी के बेटे सरकारी स्कूल में उन बच्चों के साथ पढ़ें जो प्राइवेट स्कूल का गेट भी नहीं देख पाते। हाईकोर्ट ने 6 महीने में इसे लागू करने के लिए नियम बनाने को कहा है। ऐसा नहीं है कि ये सवाल पहली बार उठा है? पहले भी लोग उठाते रहे हैं। उन लोगों में उत्तराखंड के जन कवि गिरीश तिवारी गिर्दा जी भी थे। 22 अगस्त को उनकी पांचवी पुण्यतिथि थी, इसी मौके पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुनाया। तो क्यों ना जनकवि गिर्दा जी की सोच को सबके सामने लाया जाए?

जनकवि गिर्दा के नजर में कैसा हो स्कूल हमारा?

जहां न बस्ता कंधा तोड़े, ऐसा हो स्कूल हमारा

जहां न पटरी माथा फोड़े, ऐसा हो स्कूल हमारा

जहां न अक्षर कान उखाड़े, ऐसा हो स्कूल हमारा

जहां न भाषा जख्म उघाड़े, ऐसा हो स्कूल हमारा

कैसा हो स्कूल हमारा?

जहां अंक सच-सच बतलाए, ऐसा हो स्कूल हमारा

जहां प्रश्न हल तक पहुंचाए, ऐसा हो स्कूल हमारा

जहां न हो झूठ का दिखावा, ऐसा हो स्कूल हमारा

जहां न सूट-बूट का हव्वा, ऐसा हो स्कूल हमारा

कैसा हो स्कूल हमारा?

जहां किताबें निर्भय बोले, ऐसा हो स्कूल हमारा

मन के पन्ने-पन्ने खोले, ऐसा हो स्कूल हमारा

जहां न कोई बात छुपाए, ऐसा हो स्कूल हमारा

जहां न कोई दर्द दुखाए, ऐसा हो स्कूल हमारा

कैसा हो स्कूल हमारा?

जहां न मन में मन मुटाव हो

जहां न चेहरों में तनाव हो

जहां न आंखों में दुराव हो

जहां न कोई भेद-भाव हो

जहां फूल स्वाभाविक महके, ऐसा हो स्कूल हमारा

गिर्दा एक युग, एक सांस्कृतिक संसार, एक रचनाधर्मिता, एक सवाल-एक जवाब और गरीब-गुरबों के हमदर्द थे। गिर्दा! उत्तराखंड और वहां के लोगों के बारे में बखूबी जानते थे। यहां की रीति नीति, शासन व्यवस्था, जल, जंगल और जमीन सबकी परख थी। शिक्षा के बारे में उनकी सोच हाईकोर्ट के फैसले में भी दिखी। गरीबों, किसानों का दर्द गिर्दा से बेहतर उत्तराखंड में कौन समझता था।

पानी बिन मीन पियासी

खेतों में भूख उदासी

यह उलट बांसियां नहीं कबीर

खालिस चाल सियासी

पानी बिन मीन पियासी

सोया बच्चा गाए लोरी

पहरेदार करे है चोरी

जुर्म करे है न्याय निवारण

न्याय बढ़े हैं फांसी

पानी बिन मीन प्यासी

 

गिर्दा जी समाज में फैली कुरीतियों पर भी कुठाराघात किया। उन्होंने अपनी कविता के माध्यम से लोगों क जागरूक किया।

हैलो! खबर है तुम्हें?

वो चम्मच से दूध पी गया।

गणपति बप्पा मोरिया।

बप्पा गणपति मोरिया।।

मचा तहलका दिल्ली से तो

एसटीडी पर लोड बढ़ गया

गणपति बप्पा मोरिया।

बप्पा गणपति मोरिया।।

गिर्दा जी के जाने के पांच साल बाद भी हालात नहीं बदले हैं। जो सवाल उस समय थे वो आज और तल्ख हो गए। राज्य की दशा और दिशा सही नहीं है। उत्तराखंड आज भी आपकी कमी को महसूस कर रहा है। उम्मीद करता हूं कि शिक्षा में समानता और सामाजिक संस्कृति में सकारात्मक बदलाव आएंगे और आपके सपने पूरे होंगे।

P Asnora

 पुरुषोत्तम असनोड़ा। आप 40 साल से जनसरोकारों की पत्रकारिता कर रहे हैं। मासिक पत्रिका रीजनल रिपोर्टर के संपादक हैं। आपसे purushottamasnora@gmail.com या मोबाइल नंबर– 09639825699 पर संपर्क किया जा सकता है।
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One thought on “स्कूलों में न हो सूट-बूट का हव्वा- जनकवि गिर्दा

  1. DrNishant Yadav- रे कबीर अब दर्द बहुत ही सताबे
    कैसी हुई है दूरी जो बढ़ती ही जाबे

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