ट्रिंग-ट्रिंग… चल पड़ी है बेटी मेरे गांव की

बिहार में साइकिल ने बदली बेटियों की ज़िंदगी। फोटो स्रोत-nitishspeaks.blogspot.in
बिहार में साइकिल ने बदली बेटियों की ज़िंदगी। फोटो स्रोत-nitishspeaks.blogspot.in

बिहार में इन दिनों सड़कों पर आशाएं और उम्मीदें साइकिल पर सवार दिखती हैं। जिधर देखिए उधर टिन-टिन घंटी बजाते हुए। यह आशा और उम्मीद है बिहार की लड़कियां, जो साइकिल पर सवार होकर अपने सुनहरे भविष्य की राह पर निकलती हैं। अलसुबह से ही लड़कियों का समूह स्कूल, कॉलेज, ट्यूशन और कोचिंग के लिए निकलता आपको दिख जाएगा।

साइकिल से स्कूल-कॉलेज जाती यह लड़कियां बिहार के गांवों में हो रहे सामाजिक बदलाव का प्रतीक हैं। मुझे याद है कि मैं जब छठी या सातवीं में पढ़ती थी और अपने छोटे भाई की साइकिल अपने मोहल्ले में चलाती थी तो लोग घूर-घूर कर देखते थे। लड़कियों का साइकिल चलाना लोगों को हैरान करता था।

मगर अब महज एक साइकिल ने न केवल लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाया है बल्कि अपनी पढाई पूरी करने और उसे जारी रखने का एक जज़्बा भी दिया है। खास कर ग्रामीण और पिछड़े इलाके की उन लड़कियों को जो स्कूल दूर होने की वजह से मिडिल या हाईस्कूल नहीं जा पाती थीं। अब साइकिल से वह चार-पांच किलोमीटर की दूरी भी बड़े हौसले से नाप लेती हैं।

बिहार के समस्तीपुर जिले के दलसिंहसराय ब्लॉक के एक गांव की वंदना इस साइकिल को अपने लिए वरदान मानती हैं। उनकी दो बड़ी बहनों ने प्राइमरी स्कूल से आगे का मुंह नहीं देखा क्योंकि आगे की पढाई के लिए उन्हें दलसिंहसराय आना पड़ता जो कि उनके गांव से चार किलोमीटर दूर है। अभिभावकों को यह गंवारा नहीं था कि बेटी इतनी दूर पैदल चलकर स्कूल जाए। पर वंदना को यह दिक़्क़त नहीं आई कि क्योंकि राज्य सरकार की साइकिल योजना का फ़ायदा उसे मिला।

2006 में बिहार सरकार ने लैंगिक भेदभाव खत्म करने और लड़कियों को स्कूल भेजने के लिए ‘मुख्यमंत्री साइकिल योजना’ नई पहल है। साइकिल योजना का सामाजिक प्रभाव कुछ इस तरह पड़ रहा है कि न केवल स्कूल में लड़कियों की संख्या में इज़ाफ़ा हो रहा है बल्कि उनके स्कूल छोड़ने की दर में भी कमी आई है।

यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के कार्तिक मुरलीधरन और यूनिवर्सिटी ऑफ कनेक्टिकट के निशिथ प्रकाश ने बिहार सरकार की इस योजना का अध्ययन किया है। दोनों ने पाया कि इस योजना के शुरू होने के एक साल के अंदर ही सेकेंडरी स्कूलों में लड़कियों के दाखिले में 30 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हुआ। इन्होंने पाया कि एसएससी परीक्षा देने वाली लड़कियों की संख्या में भी 10 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई।

बिहार के स्कूलों में ज़्यादातर लड़कियां नौंवी कक्षा में स्कूल छोड़ दिया करती थी। मुख्य वजह यही कि हाई स्कूल की दूरी उनके घरों से कई किलोमीटर की है। पर इस योजना के शुरू होने के चार साल के अंदर नौंवी में दाखिला लेने वाली लड़कियों की संख्या में जबरदस्त इज़ाफ़ा देखने को मिला। योजना शुरू होने से पहले जहां नौंवी में दाखिला लेने वाली लड़कियों की संख्या 1 लाख 75 हज़ार थी वह चार साल में बढकर 6 लाख तक पहुंच गई।

यह साइकिल योजना राज्य में एक नए बदलाव की ओर संकेत कर रही है। सड़क पर साइकिल चलाते, घंटी बजाते और एक-दूसरे से होड़ लगाते हुए इन लड़कियों में अब एक बेफ़िक्री दिखाई देती है।

नालंदा के एक गांव से गुजरते हुए लडकियों की एक टोली से सवाल पूछा था कि साइकिल से तुमलोगों को क्या फ़ायदा मिला है? एक साथ सभी बोल पडीं-क्या-क्या बताएं? पहले हम स्कूल और टयूशन जाते हैं और फिर यह परिवार वालों के लिए काम आती है। सुमन का जवाब था मेरी पढ़ाई का काम ख़त्म होने के बाद पिताजी इससे अपनी दुकान भी जाते हैं। उसने कहा कि साइकिल का साथ नहीं होता तो पिताजी कभी स्कूल की पढ़ाई के बाद कॉलेज जाने की इजाज़त नहीं देते। सुमन खुश है कि अब वह जल्दी ही कॉलेज भी इसी साइकिल से जाएगी। रूपाली ने कहा कि पहले पैदल जाने में कई तरह का डर लगा रहता था अब साइकिल से सफ़र आसानी से तय हो जाता है।

pritibha jyoti profileप्रतिभा ज्योति। पिछले डेढ़ दशक से प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में सक्रिय। इन दिनों पुस्तक लेखन में मशगूल।

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3 thoughts on “ट्रिंग-ट्रिंग… चल पड़ी है बेटी मेरे गांव की

  1. wonderful!!!!! a good piece of work on the developement. an ossam step towards our roots(villages)

  2. Kishore Kumar वाकई, लड़कियों के जीवन में अभूतपूर्व बदलाव का एक जरिया बन गया है साइकिल। ( फेसबुक से)

  3. प्रतिभा जी …. बहुत ही बढ़िया लेख, प्रेरणादायी होगा गाँव की बच्चियों के लिए ! आपका प्रयास उत्तम लगा !

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