ज़हर और कहर का ‘कॉकटेल’ पीकर कैसे ज़िंदा हैं वो लोग?

पुष्यमित्र

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अजब है सियासत- आंखों पर ‘पानी’ ही नहीं। और ‘ज़हरीले पानी’ से मासूमों का ये हाल। फोटो-पुष्यमित्र

गया पहुंचते ही मेरे मार्गदर्शक ‘मगध जल जमात’ के सक्रिय सदस्य प्रभात कुमार ने मुझे चेता दिया कि भूल से भी गया शहर के किसी होटल का पानी नहीं पीजियेगा, आप पचा नहीं पायेंगे। वैसे भी पानी की जो विषैली गंध है, वही आपको उस पानी को पीने नहीं देगी।  हमलोग तो दो घंटे के लिए भी बाहर निकलते हैं, तो पानी की बोतल साथ में रख लेते हैं। हालांकि मगध के इलाके के पानी के लिए प्रभात कुमार ने जो टिप्पणी की थी वह मेरे लिए चौकाने वाली नहीं थी, मगर हैरत की बात यह थी कि होटल वाले भी अपने ग्राहकों के लिए ढंग का पानी नहीं रखते। ख़ास तौर पर यह देखते हुए कि बोधगया और पितृ पक्ष मेला की वजह से गया एक अंतरराष्ट्रीय किस्म के शहर में तब्दील हो चुका है। यहां देशी-विदेशी पर्यटकों की भीड़ बारहों महीने रहती है। हो सकता है, प्रभातजी ने बड़े होटलों के बारे में यह नहीं कहा हो, जहां ऐसे पर्यटक ठहरते हैं।

चुनावी ज़मीन पर मुद्दों की पड़ताल-1 

इन दिनों गया शहर में पितृपक्ष का मेला उफान पर है, सारे होटल पिंड दान करने वालों की भारी भीड़ की वजह से पहले से ही हाउसफुल हैं। लोगों ने अपने घरों के कमरे भी किराये पर उठाने शुरू कर दिये हैं। शहर में गेरुआ कपड़े पहने लोगों की अच्छी खासी भीड़ है, पिंड दानी सिर मुड़ाये यहां वहां भटकते नजर आते हैं। साथ में कुछ विदेशी सैलानी, जिनके लिए यह हिंदू धर्म की इस अजीबो-गरीब रस्म को देखने समझने और कैमरे में कैद कर लेने लायक मौका है। फल्गु नदी और वैतरणी तालाब को कम से कम इन पंद्रह दिनों के लिए साफ सुथरा बना लिया गया है। मगर मेरी मंज़िल न फल्गु नदी थी, और न ही वैतरणी तालाब। हम शहर से लगभग दस किमी दूर स्थित चूरी पंचायत के कुछ गांवों की तरफ जा रहे थे, जिनके बारे में सूचना थी कि पीने के पानी के संक्रमण की वजह से यहां के पचासों बच्चे और युवा विकलांग हो गये हैं। जोड़ों के दर्द की वजह से गांव के अधिकतर लोग उठने-बैठने और मेहनत-मजूरी करने से भी लाचार हो गये हैं। लगभग पूरी पंचायत फ्लोरोसिस नामक गंभीर बीमारी की चपेट में है और वह भी महज शुद्ध पेयजल की अनुपलब्धता की वजह से।

चूंकि मैं फ्लोरोसिस प्रभावित कई गांवों की यात्रा कर चुका हूं, इसलिए यह जानकारी मेरे लिए चौंकाने वाली नहीं थी। मैं बस यह समझने जा रहा था कि आखिर वह कौन सी बाधा है जो इन गांवों को शुद्ध पेयजल का उपभोग करने नहीं दे रही। साफ पानी ही तो पीना है। अगर आप साफ पानी पीयेंगे तो, एक तो आपको इस तरह की गंभीर किस्म की बीमारी नहीं होगी। दूसरे, अनजाने में जिन लोगों को यह बीमारी हो गयी है, उनको भी काफी आराम पहुंचेगा। आज पंचायत से लेकर दिल्ली की सरकार तक के पास काफी पैसा है। शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के वादे और दावे हैं। फिर भी क्यों एक पूरी पंचायत विकलांगता का शिकार हो जाती है। और लोग जो इस तरह की गंभीर बीमारी के शिकार हो जा रहे हैं, जिनको वोट देते हैं, उन पर दबाव क्यों नहीं बनाते कि वे उन्हें इस ख़तरनाक स्थिति से मुक्ति दिलायें।

राम कहिए, किशन कहिए या फिर राम किशन। भगवान की नज़र पड़ती नहीं, नेताजी को नज़र आता नहीं। फोटो-पुष्यमित्र
राम कहिए, किशन कहिए या फिर राम किशन। भगवान की नज़र पड़ती नहीं, नेताजी को नज़र आता नहीं। फोटो-पुष्यमित्र

पहला गांव इस्माइलपुर बहादुर बिगहा था। घुसते के साथ ईंट पर बैठे मिले 27 साल के युवक राम कृष्ण (पहली तसवीर)। तसवीर में जब आप उन्हें देखेंगे तो पायेंगे कि वे न राम हैं न कृष्ण, वे तो बामन देव बनकर रह गये हैं। उनकी ऊंचाई बमुश्किल साढ़े तीन या चार फीट होगी। पांव मुड़ गये हैं। उनके लिए चलना-फिरना मुहाल है। जन्म से वे ऐसे नहीं थे। 15 साल की उम्र तक उनके शरीर की बनावट किसी आम किशोर जैसी ही थी। मगर फिर अचानक उनके पांव मुड़ने लगे और पांव के मुड़ने की वजह से उनकी हाइट भी कम होने लगी। अब वे युवा तो हैं, मगर किसी काम के नहीं। मेहनत-मजूरी उनके बस की नहीं। ऐन पढ़ने-लिखने की उम्र में यह ‘हादसा’ हुआ तो पढ़ाई-लिखाई भी छूट गयी।

सियामनी देवी। इनकी कराह सुन कर आप सिहर उठेंगे। पर ये और इनका परिवार इस हालत को सहन करने का आदि हो गया। फोटो-पुष्यमित्र
सियामनी देवी। इनकी कराह सुन कर आप सिहर उठेंगे। पर ये और इनका परिवार इस हालत को सहन करने का आदि हो गया। फोटो-पुष्यमित्र

थोड़ा आगे बढ़ने पर मिली सियामनी देवी। 45-50 साल उम्र है। मगर लगती सत्तर की हैं। पांच साल से बिस्तर पर हैं। शरीर में तेज लहर, दर्द और झुनझुनी की शिकायत है। हमेशा कराहती रहती हैं। दर्द जब तेज होता है तो तेज आवाज़ में चीखने-चिल्लाने लगती हैं। घर वाले चाह कर भी इनकी कोई मदद नहीं कर पाते। इन दिनों पांव में एक अजीब किस्म का घाव हो गया है। जिस पर मक्खियां भिनभिनाती रहती हैं। मगर खुद में इतनी ताकत नहीं बची है कि इन मक्खियों को उड़ा पायें। उनकी हालत तो ऐसी है कि करवट बदलने के लिए भी दूसरों की मदद लेनी पड़ती है। मगर मदद भी करे तो कौन ? उनके पति खुद फ्लोरोसिस के शिकार हैं। किसी तरह चलते-फिरते हैं। बैठ गये तो उठना मुहाल। खेतों में बिखरे अनाज के दाने बटोर कर खाना-पीना होता है। तीन बेटे हैं, उन्हें भी कुछ न कुछ परेशानी है। एक बेटा फिर भी रोजी-रोजगार करता है, मगर वह पूरे परिवार का भार उठाने के लिए तैयार नहीं।

ये लोग रविदास हैं यानी महादलित। इतनी परेशानियों के बावजूद इनके मन में मांझी को जिताने का सपना है, हालांकि ये मुखर नहीं होते। मुखियाजी राम खेलावन यादव विधायक जी के आदमी हैं। कोई सुन लेगा तो ‘परोबलम’ हो जायेगा।  इसलिए राजनीति की बातें फुसफुसाकर करते हैं। मैंने जब पूछा कि मांझी के जीतने से क्या उनकी समस्या का समाधान हो जायेगा, दरद-लहर सब ठीक हो जायेगा? तो कहते हैं, नही बाबू… सबको भोट चाहिये। आजकल, काम कहां कोई करता है। चाहे इ हो, चाहे ऊ हो, सब एक्के रंग का है। मगर अपना जात-बिरादरी है तो कुछ तो देखना पड़ता है, बाबू।

सुरेंद्र यादव, बेला के विधायक।
सुरेंद्र यादव, बेला के विधायक।

यह क्षेत्र बेला विधानसभा के अंतगर्त आता है। यहां के विधायक सुरेंद्र यादव हैं। लगातार चार बार से चुनाव जीत रहे हैं। बाहुबली हैं, अजेय माने जाते हैं। पिछले चुनाव में इनके खिलाफ जदयू ने एक मुस्लिम उम्मीदवार को मैदान में उतारा था, इस उम्मीद में कि इस क्षेत्र में मुसलमानों की बड़ी आबादी है। मगर मुसलमानों ने महजब को तरजीह नहीं दी। इस बार भी ‘हम’ पार्टी ने एक मुसलमान को उतारा है।

मैंने पूछा, विधायक जी इस बार वोट मांगने आयेंगे तो पूछियेगा न कि आप लोगों की समस्या का समाधान करवा दें? तो गांव के जोगिंदर मोची कहते हैं, हमरे गांव में विधायक जी उतरते भी कहां हैं, गाड़ी के खिड़की से हाथ जोड़े चले जाते हैं। हमलोग भी सोचते हैं कि धुर, जब दूसरा कोई आदमी जितबे नहीं करता है तो इनको ही भोट दे दिया जाये। काहे मुखिया जी से संबंध खराब किया जाये।

गांव का बच्चा-बच्चा जान गया है कि यह भीषण रोग सिर्फ पानी के कारण हो रहा है। पेयजल विभाग के लिए सालों पहले गांव के हैंडपंपों का पानी चेक करके गये हैं और हैंडपंप पर लाल निशान लगा दिया गया है। यानी यहां का पानी खतरनाक है, इसे न पीयें। पांच साल पहले वैकल्पिक उपाय भी किये गये। लाखों की लागत से इस पंचायत में दो वाटर ट्रीटमेंट प्लांट लगाये गये। पाइप बिछाकर पेयजल उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गयी। इन प्लांटों का पानी कुछ दिन तो रविदास टोले में पहुंचा फिर बंद हो गया। क्यों? इसका जवाब देते हुए टोले के लोग कहते हैं कि उसी समय सड़क बन रही थी तो पाइप टूट गया और इधर पानी आना बंद हो गया। अब मुखियाजी पाइप ठीक कराते नहीं हैं, कहते हैं कि अगर पानी चाहिये तो उनके दरवाजे से लेकर आयें। दरअसल, यह प्लांट मुखिया जी के दरवाजे पर बिठाया गया है, जो इस टोले से कम से कम डेढ़ दो किमी दूर है। लोग वहां भी जाकर पानी ले आते, मगर यह भी उतना आसान नहीं है। वहां जाने पर मुखिया जी टोका-टोकी करने लगते हैं। अक्सर झगड़े की स्थिति बन जाती है। लोगों का कहना है कि दरअसल मुखियाजी चाहते ही नहीं है कि दूसरे टोले के लोग इस पानी का इस्तेमाल करें। वे इस पूरे फ्लोराइड मुक्त जल का इस्तेमाल खुद करना चाहते हैं, अपने टोले के लोगों को करने देना चाहते हैं। रविदास टोले के लोगों का आरोप है कि वहां स्थिति ऐसी है कि मुखियाजी के भैंसों को भी इस पानी से नहलाया जाता है, मगर हमें पीने का पानी भी नहीं मिलता।

यह पानी की राजनीति है, जो देश व्यापी है। पेयजल विभाग के संसाधनों पर गांव की दबंग जातियां हर बार कब्जा कर लेती हैं और दलित, गरीब-गुरबों के हाथ में कुछ नहीं आता। चापाकल लगना हो, या नल की टोटी। हमेशा मुखियाजी और उनके करीबियों के घर के पास लग जाते हैं। समाज का निचला तबका पेयजल की इस राजनीति का शिकार होकर हमेशा दूषित जल पीता रहता है। आज भी इस्माइलपुर बहादुरपुर बिगहा के लोग बेख़ौफ़ होकर लाल निशान वाले हैंडपंप का पानी पी रहे हैं। यह जाने बगैर कि इन पंपों से जो पानी निकल रहा है, उसमें 17 मिग्रा प्रति लीटर की दर से फ्लोराइड भी है। यह मात्रा देश में संभवतः सर्वाधिक है। तयशुदा मानकों के मुताबिक अगर पानी में 1.5 मिग्रा प्रति लीटर से अधिक फ्लोराइड हो तो वह पीने लायक नहीं होता।

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चुड़ावन नगर, वाटर प्यूरीफायर की जगह और हालत देखिए। फोटो-पुष्यमित्र

मगर यह पेयजल की राजनीति का एक चरण है। इस राजनीति के कई और चरण हैं। फिर हम चुड़ावन नगर पहुंचते हैं। वह भी इसी पंचायत का हिस्सा है। भोक्ता लोगों की इस बस्ती में भी एक वाटर प्यूरीफायर लगा है। इस वाटर प्यूरीफायर में पानी तो साफ होता है, मगर वहां की व्यवस्था कैसी है, यह आप देखकर अंदाजा लगा सकते हैं। गांव के लोग बताते हैं कि ये लोग इसी प्यूरीफायर का पानी पीते हैं। फिर ऐसा क्यों हुआ? इस सवाल का उनके पास कोई जवाब नहीं है। पांच साल पहले लगे इस प्यूरीफायर ने पानी को फ्लोराइड मुक्त करना बंद कर दिया है।

बाद में कुछ सरकारी सूत्रों से जानकारी मिलती है कि लखनऊ की संस्था वाटर लाइफ ने इन संयंत्रों को स्थापित किया था और निगरानी और मरम्मत का ठेका भी उनके ही पास है। फ्लोराइड ट्रीटमेंट प्लांट में नियमित निगरानी की ज़रूरत होती है और मशीन खराब हो जाये तो उसे ठीक करना और तयशुदा वक्त पर उसके मेंब्रेन को बदलना जरूरी होता है. मगर इंस्टॉलेशन के बाद लखनऊ की वह संस्था दुबारा लौट कर इन गांवों में आयी ही नहीं. लिहाजा इन प्लांट से जो पानी साफ हो रहा है वह गांव के लोगों की जरूरतें पूरी नहीं कर पा रहा. सरकारी रिकार्ड्स में इन गांवों को फ्लोराइड मुक्त मान लिया गया है. मगर फ्लोराइड ने एक बार फिर गांव के बच्चों पर हमला कर दिया है.

इसी साल की शुरुआत में मैं नवादा के कचरियाडीह गांव में भी गया था। वहां की हालत भी कुछ ऐसी ही थी। मेंटनेंस के अभाव में प्लांट बंद पड़ा था और एजेंसी गायब थी। सरकारी खातों में उस गांव को भी फ्लोराइड मुक्त मान लिया गया था। दरअसल, पूरे दक्षिण बिहार में लोग जाने-अनजाने फ्लोराइड युक्त पानी पी रहे हैं। बिहार सरकार के आंकड़ों के मुताबिक 11 जिलों की 4157 बस्तियों के पानी में फ्लोराइड की मात्रा तयशुदा मानक से अधिक है। ये जिले हैं, नालंदा, औरंगाबाद, भागलपुर, नवादा, रोहतास, कैमूर, गया, मुंगेर, बांका, जमुई और शेखपुरा। वास्तविक धरातल पर अगर ईमानदारी से पता किया जाये तो ये आंकड़े भी ग़लत साबित होंगे। इन आंकड़ों के मुताबिक गया की सिर्फ 129 बस्तियों में ही फ्लोराइड की मात्रा मानकों से अधिक है, मगर सरकारी सूत्र ही बताते हैं कि ऐसी बस्तियों की संख्या 517 है।

मासूमों के इन चेहरों में न जाने कितने सवाल सिमटे हैं, आप पढ़ने की कोशिश तो करें। फोटो-पुष्यमित्र
मासूमों के इन चेहरों में न जाने कितने सवाल सिमटे हैं, आप पढ़ने की कोशिश तो करें। फोटो-पुष्यमित्र

जानकार बताते हैं कि हड्डियों का मुड़ना फ्लोरोसिस का अंतिम चरण है। इसके अलावा भी इस रोग के कारण कई परेशानियां होती हैं। जैसे, खाने का नहीं पचना, गैस्ट्रिक्ट, दांतों का घिसना, जोड़ों का दर्द। अब इन रोगों को कोई फ्लोरोसिस के तौर पर नहीं लेता। वह नहीं मानता कि उसके पेयजल में कोई ख़राबी है। बिहार के लोगों के लिए फ्लोराइड संक्रमण ही एक बड़ा खतरा नहीं है. मध्य बिहार के 13 जिले आर्सेनिक के कहर के शिकार हैं। ये जिले हैं- बक्सर, भोजपुर, सारण, पटना, वैशाली, समस्तीपुर, बेगुसराय, भागलपुर, लखीसराय, मुंगेर, खगड़िया, दरभंगा और कटिहार। कोसी-सीमांचल के नौ जिलों के लोग आयरनयुक्त जल पीने को विवश हैं। ये जिले हैं, खगड़िया, पूर्णिया, कटिहार, अररिया, सुपौल, किशनगंज, बेगूसराय, मधेपुरा और सहरसा।

यानी तकरीबन पूरा बिहार पीने के पानी में आर्सेनिक, आयरन या फ्लोराइड जैसे विषैले तत्वों को पीने के लिए विवश है। अब एक नया ज़हरीला तत्व सामने आया है- नाइट्रेट, जो गर्भस्थ और नवजात शिशुओं के लिए काल के समान है। इन तत्वों की वजह से बड़ी आबादी तरह-तरह की छोटी-बड़ी बीमारियों की चपेट में है, मगर आज चुनावी बहस में शुद्ध पेयजल का सवाल किसी की जुबान पर नहीं है।

PUSHYA PROFILE-1


पुष्यमित्र। पिछले डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय। गांवों में बदलाव और उनसे जुड़े मुद्दों पर आपकी पैनी नज़र रहती है। जवाहर नवोदय विद्यालय से स्कूली शिक्षा। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता का अध्ययन। व्यावहारिक अनुभव कई पत्र-पत्रिकाओं के साथ जुड़ कर बटोरा। संप्रति- प्रभात खबर में वरिष्ठ संपादकीय सहयोगी। आप इनसे 09771927097 पर संपर्क कर सकते हैं। 


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One thought on “ज़हर और कहर का ‘कॉकटेल’ पीकर कैसे ज़िंदा हैं वो लोग?

  1. Fantastic report on water, based on minerals excess. I too have felt Iron excess in Araria, Bihar.

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