अपनी पगली बिटिया पर नाज करते थे पापा

अपनी पगली बिटिया पर नाज करते थे पापा

पशुपति शर्मा के फेसबुक वॉल से

कबीर बादल प्रेम का, हम पर बरसाई।
अंतरी भीगी आत्मा, हरी भरी बनराई।।

पापा ने मां से भी ज्यादा कोमल हृदय पाया। इस हृदय में प्रेम के घने बादल उमड़ते घुमड़ते। किसी भी भावुक पल में पापा की आंखें छलछला जातीं। इन आंसुओं से हमारी आत्मा तक तर हो जाती, धुल जाती। हमारी आत्मा में भी प्रेम के बीज अंकुरित हो उठते, प्रेम के हरे भरे भाव लहलहा उठते।

पिता अनंत, पिता कथा अनंता-5

दीदी के पिता। हम भाई बहनों में दीदी इकलौती बिटिया रानी। बड़ी बिटिया होने के नाते, जाहिर है हमसे ज्यादा प्रेम दीदी पर बरसा। माता पिता की पहली संतान प्रेम का लगभग आधा हिस्सा हथिया लेती है। बाकियों को आधे से ही काम चलाना पड़ता है। पर प्रेम का ये मेरा हिसाब दीदी के पल्ले न पड़ेगा।

बीणा दीदी। 1987 में दीदी की शादी हुई। पिता ने प्रेम की पावर ऑफ अटॉर्नी जीतूजी के नाम कर दी। पर बेटी से प्रेम की मिल्कियत ता उम्र पिता के पास रहती है, मेरे पापा तो इस मिल्कियत पर और बड़ा दावा रखा करते। पर दीदी की हमेशा एक ही शिकायत रही- आप बेटों से ज्यादा प्यार करते हैं। पापा लाख सफाई देते- ‘ना बेटी इसी कोई बात कोनी’। पर दीदी अपनी रट से पिता का दिमाग खा जाती।

आपने एक शब्द कई बार सुना होगा-सौतिया डाह। दीदी की पिता पर कब्जे की इस बाल आकांक्षा को हम बिटिया डाह भी कह सकते हैं। प्यारी बिटिया की चाह कब बिटिया डाह तक पहुंच जाती है, बिटिया रानी को पता नहीं चलता। मेरी दीदी को भी नहीं। पिता की तरह मेरी दीदी भी हमसे बेइंतहा प्यार करती हैं पर पापा के प्यार का बंटवारा करते वक्त वो स्वार्थी हो जाती हैं।

दीदी का पिता से प्रेम का ये झगड़ा भी उतना ही प्यारा है। दीदी एक तरह से प्रेम की ठेकेदारी प्रथा बनाना चाहती रहीं। पिता केवल उनको प्यार करें और बाकी भाई बहनों से प्यार का ठेका उनको दे दें। कई बार पापा से दीदी के झगड़ों की वजह यही चाहत भी रही। चचेरे, ममेरे, फुफेरे भाई बहनों को पापा के प्रेम की हिस्सेदारी मांगते देख दीदी का दिल कुढने लगता। माफ करना दीदी, पर आपके व्यवहार में ये ‘बिटिया चाह’ बनी रही। पापा इस भाव को बखूबी समझते और दीदी को कुढा कर, चिढा कर मंद मंद मुस्काते।

जानती हो दीदी, आपकी किसी बात का पापा बुरा क्यों नहीं मानते थे? वो इस प्रेम का आनंद लेते थे। अपनी पगली बिटिया पर नाज करते थे। प्रेम का पागलपन, गुस्सा, शिकायत सब आहलाद के हेतु हैं। आप ने हमेशा हमारे पिता को आहलादित रखा, आपका शुक्रिया।

मां सच कहती हैं- हरितवाल की बेटियों को पिताओं ने बिगाड़ के रखा। बुआ मेरे दादा की बिगड़ैल बेटी। सोनी, छोटी, मोनी पापा और ताऊ की बिगड़ैल बेटी। रिद्धि और पीहू ने भी हरितवाल की बेटियों का रंग पकड़ना शुरू कर दिया है।

दीदी, मेरी तरह पापा के प्रेम को हासिल करने के लिए किसी कतार में नहीं लगती, वो तो अमिताभ की तरह जहाँ से खड़ी हो जायें वहीं से कतार मानती हैं। प्रेम का ये अजब झगड़ा देखिये, दीदी पापा को लेकर मुझसे भी होड़ करतीं। मुझी से हजार बार कहतीं, पापा तुमको सबसे ज्यादा प्यार करते हैं, तुम्हारी सबसे ज्यादा चिंता करते हैं। मेरे हरि की ये प्रेम लीला भी गजब थी, मेरी चिंता भी वो उस दीदी के जरिये करते जो इस बात की चिंता में घुलती रहतीं कि प्रेम का पलड़ा किधर झुक रहा है। दीदी से मेरा हाल चाल पूछते।

रूठे सुजन मनाइए, जो रूठे सौ बार
रहिमन फिरि पोइये, टूटे मुक्ता हार

दीदी, पापा आपके संग प्रेम की माला बिखेरने और फिर पोने का खेल खेलते रहे। मुझसे प्रेम में चिंता भाव प्रबल रहा, आप से प्रेम में निश्चिंत भाव। दोनों की विह्वलता का फर्क तो रहेगा।

संजय भैया से पापा के प्रेम में वियोग की पीड़ा रही। राजू से प्रेम में मौन भाव प्रबल रहा। बस दो प्रेमियों ने एक दूसरे को नित निहारकर ही आत्मा तृप्त कर ली। चंदन से प्रेम में सखा भाव प्रबल। दोनों लड़े झगड़े और उलाहने के लिए आपके पास पहुंचे। भोमल के प्रेम में श्रद्धा भाव। अगाध श्रद्धा और सेवा भाव से ताऊ पर हक जमा लिया। सबसे छोटा सोमल ताऊ के वात्सल्य का सबसे लंबे वक्त का अधिकारी। 30 साल के सोमल ने अपनी प्यारी मुस्कान से कह दिया, अभी बच्चा ही रहना है। पांचों बहुओं को भी हमसे प्रेम की पावर ऑफ अटॉर्नी मिली है, मिल्कियत तो सदा पापा-मां और चाचा-चाची के पास है।

कबीर यह घर प्रेम का, खाला का घर नाहिं।
सीस उतारै हाथ करि, सो पैठे घर मांहि।।

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